■ सूर्यकांत उपाध्याय

कंधे पर कपड़े का थान लिये नामदेव जी हाट जाने को तैयार थे।
पत्नी ने व्यथा सुनायी, “घर में आटा-चावल सब खत्म है।
शाम को लौटते समय कुछ राशन ले आइयेगा। बच्चे छोटे हैं, उनके लिये तो अवश्य।”
नामदेव जी मुस्कराये, “जैसी विठ्ठल की इच्छा होगी।”
बाजार पहुँचे तो एक फकीर ने दो चादरों भर कपडे की विनती की। जिसे दान में जितना चाहिये था, संयोग से नामदेव जी के थान में उतना ही था। उन्होंने पूरा थान दे दिया।
लौटते समय पत्नी और भूखे बच्चों की याद आयी। अब दाम भी नहीं, थान भी नहीं। वे पीपल के नीचे बैठ गये, “जब सारी सृष्टि की सार-संभाल विठ्ठल करता है तो मेरे घर की भी संभाल वही करेगा।”
इधर, घर पर विठ्ठल स्वयं सेवक बनकर पहुँचे। दरवाजा खुला और राशन उतरना ऐसा शुरू हुआ कि झोपडी छोटी पड़ गई।
पत्नी हैरान, “इतना सामान? नामदेव जी ने भेजा है?”
भगवान बोले, “आज नामदेव का थान मेरी सरकार ने खरीदा है। जितना उसका सामर्थ्य था, उसने दिया; अब जितना मेरा है, वह दे रहा हूँ। जगह और बताओ।”
बच्चे खुश! कभी गुड़, कभी मेवे चखते।
नामदेव जी अभी तक लौटे न थे।
पत्नी ने कहा,“अब संत जी के आने पर ही बाकी सामान लाना; हम उन्हें लेने जा रहे हैं।”
नामदेव जी गाँव के बाहर भजन में लीन मिले। घर लौटने पर पत्नी बोली, “अच्छा मूल्य मिला तो इतने सामान की क्या जरूरत थी?”
नामदेव जी मुस्कराये। बच्चों के उजले चेहरे देखकर सब समझ गये कि ये मेरे विठ्ठल की लीला है।
वे हँसकर बोले, “वो सरकार जब देने पर आती है तो लेने वाले थक जाते हैं। उसका उपहार कभी खत्म नहीं होता।”
