■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार की बात है, एक बढ़ई था। वह दूर किसी शहर में एक सेठ के यहाँ काम करने गया। एक दिन काम करते-करते उसकी आरी टूट गई। बिना आरी के वह काम नहीं कर सकता था और वापस अपने गाँव लौटना भी मुश्किल था। इसलिए वह शहर से सटे एक गाँव पहुँचा। इधर-उधर पूछने पर उसे एक लोहार का पता चला।
वह लोहार के पास गया और बोला,
“भाई, मेरी आरी टूट गई है। तुम मेरे लिए एक अच्छी-सी आरी बना दो।”
लोहार बोला,“बना दूँगा, पर इसमें समय लगेगा। तुम कल इसी वक्त आकर मुझसे आरी ले सकते हो।”
बढ़ई को जल्दी थी, इसलिए उसने कहा,
“भाई, कुछ पैसे ज़्यादा ले लो पर मुझे अभी आरी बनाकर दे दो।”
लोहार ने समझाया,“बात पैसे की नहीं है, भाई। अगर मैं इतनी जल्दबाजी में औज़ार बनाऊँगा तो मुझे खुद उससे संतुष्टि नहीं होगी। मैं औज़ार बनाने में कभी अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखता।”
बढ़ई मान गया और अगले दिन आकर अपनी आरी ले गया। आरी बहुत अच्छी बनी थी। बढ़ई पहले की अपेक्षा अधिक आसानी से और बेहतर काम करने लगा। खुशी-खुशी उसने यह बात अपने सेठ को भी बताई और लोहार की खूब प्रशंसा की।
सेठ ने आरी को ध्यान से देखा और पूछा,
“इसके कितने पैसे लिए उस लोहार ने?”
“दस रुपये!” बढ़ई ने जवाब दिया।
सेठ ने मन ही मन सोचा कि शहर में इतनी अच्छी आरी के तो कोई भी तीस रुपये देने को तैयार हो जाएगा। क्यों न उस लोहार से ऐसी दर्जनों आरियाँ बनवाकर शहर में बेची जाएँ!
अगले दिन सेठ लोहार के पास पहुँचा और बोला,
“मैं तुमसे ढेर सारी आरियाँ बनवाऊँगा और हर आरी के दस रुपये दूँगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। आज के बाद तुम सिर्फ मेरे लिए काम करोगे। किसी और को आरी बनाकर नहीं बेचोगे।”
लोहार बोला,
“मैं आपकी शर्त नहीं मान सकता।”
सेठ ने सोचा कि लोहार को और अधिक पैसे चाहिए। वह बोला,
“ठीक है, मैं तुम्हें हर आरी के पंद्रह रुपये दूँगा। अब तो मेरी शर्त मंज़ूर है।”
लोहार ने कहा,
“नहीं, मैं अब भी आपकी शर्त नहीं मान सकता। मैं अपनी मेहनत का मूल्य खुद तय करता हूँ। मैं इस दाम से संतुष्ट हूँ, इससे ज़्यादा मुझे नहीं चाहिए और न ही मैं आपके लिए काम कर सकता हूँ।”
सेठ आश्चर्य से बोला,
“बड़े अजीब आदमी हो! भला कोई आती हुई लक्ष्मी को मना करता है?”
लोहार ने शांत स्वर में कहा,
“आप मुझसे आरी लेंगे और फिर उसे दुगने दाम में गरीब खरीदारों को बेचेंगे। मैं किसी गरीब के शोषण का माध्यम नहीं बन सकता। अगर मैं लालच करूँगा, तो उसका भुगतान कई लोगों को करना पड़ेगा। इसलिए मैं आपका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सकता।”
सेठ समझ गया कि एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति को दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती। वह अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है।
अपने हित से ऊपर उठकर दूसरों के बारे में सोचना एक महान गुण है। लोहार चाहता तो आसानी से अच्छे पैसे कमा सकता था, पर वह जानता था कि उसका थोड़ा-सा लालच बहुत से ज़रूरतमंद लोगों के लिए नुक़सानदायक साबित होगा। इसलिए वह सेठ के लालच में नहीं पड़ा।
शिक्षा : अगर ध्यान से देखा जाए, तो लोहार की तरह ही हममें से अधिकतर लोग यह जानते हैं कि कब हमारे स्वार्थ की वजह से दूसरों को नुक़सान होता है। फिर भी हम अपने फायदे के लिए वही काम करते हैं। हमें इस व्यवहार को बदलना होगा। दूसरे लोग क्या करते हैं, इसकी परवाह किए बिना हमें खुद यह तय करना होगा कि हम अपने लाभ के लिए ऐसा कोई काम न करें, जिससे दूसरों को तकलीफ़ पहुँचे।
