■ सूर्यकांत उपाध्याय

वृंदावन की एक गोपी प्रतिदिन दूध-दही बेचने मथुरा जाया करती थी। एक दिन व्रज में एक संत आए। गोपी भी उनकी कथा सुनने गई।
कथा के दौरान संत कह रहे थे, ‘भगवान के नाम की बड़ी महिमा है। नाम से बड़े-बड़े संकट टल जाते हैं। नाम भवसागर से पार लगाने वाला है।
यदि भवसागर से पार होना है तो भगवान का नाम कभी मत छोड़ना।’
कथा समाप्त हुई। अगले दिन गोपी फिर दूध-दही बेचने निकली। रास्ते में यमुना जी थीं। गोपी को संत की बातें स्मरण हो आईं। संत ने कहा था कि भगवान का नाम भवसागर से पार लगाने वाला है।
गोपी ने मन में विचार किया, ‘जिस भगवान का नाम भवसागर से पार लगा सकता है, क्या वही नाम मुझे इस साधारण-सी नदी से पार नहीं लगा सकता?’
ऐसा सोचकर गोपी ने मन में भगवान के नाम का आश्रय लिया और भोली-भाली गोपी यमुना जी की ओर आगे बढ़ गई। जैसे ही उसने यमुना जी में पैर रखा, उसे ऐसा लगा मानो वह भूमि पर चल रही हो। वह सहज ही पूरी नदी पार कर गई।
पार पहुँचकर वह अत्यंत प्रसन्न हुई और मन में सोचने लगी, ‘संत ने तो बड़ा ही अच्छा उपाय बताया। अब रोज-रोज नाविक को पैसे भी नहीं देने पड़ेंगे।’
एक दिन गोपी ने सोचा कि संत ने मेरा इतना भला किया है, मुझे उन्हें भोजन पर बुलाना चाहिए। अगले दिन जब गोपी दही बेचने गई तो उसने संत से घर पर भोजन करने का आग्रह किया। संत सहर्ष तैयार हो गए।
मार्ग में फिर यमुना नदी आई। संत नाविक को बुलाने लगे, तो गोपी बोली, “बाबा, नाविक को क्यों बुला रहे हैं? हम ऐसे ही यमुना जी पार कर लेंगे।”
संत बोले, “गोपी! यह कैसी बात कर रही हो? यमुना जी को ऐसे कैसे पार करेंगे?”
गोपी ने कहा, “बाबा, आपने ही तो मार्ग बताया था। आपने कथा में कहा था कि भगवान के नाम का आश्रय लेकर भवसागर से पार हो सकते हैं।
तो मैंने सोचा, जब भवसागर से पार हो सकते हैं, तो यमुना जी से पार क्यों नहीं हो सकते? इसलिए अब मुझे नाव की आवश्यकता नहीं पड़ती।”
संत को विश्वास नहीं हुआ। बोले, “गोपी, पहले तू चल। मैं तेरे पीछे-पीछे आता हूँ।”
गोपी ने भगवान के नाम का आश्रय लिया और प्रतिदिन की भाँति सहज ही यमुना जी पार कर गई। अब जैसे ही संत ने यमुना जी में पैर रखा, वे छपाक से पानी में गिर पड़े। संत को बड़ा आश्चर्य हुआ।
जब गोपी ने देखा कि संत पानी में गिर गए हैं तो वह लौट आई। गोपी ने संत का हाथ पकड़ा और जैसे ही आगे बढ़ी, संत भी गोपी की भाँति भूमि पर चलने लगे।
संत गोपी के चरणों में गिर पड़े और बोले, “गोपी, तू धन्य है!
वास्तविक अर्थों में नाम का आश्रय तूने लिया है। मैंने नाम की महिमा तो बताई पर स्वयं नाम का आश्रय नहीं लिया।”
सच में, भक्त मित्रो, हम भगवान के नाम का जप और आश्रय तो लेते हैं पर नाम में पूर्ण विश्वास और श्रद्धा न होने के कारण उसका संपूर्ण लाभ प्राप्त नहीं कर पाते।
शास्त्र बताते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम इतने पापों को नष्ट कर सकता है, जितने पाप एक पापी व्यक्ति जीवनभर में कर भी नहीं सकता।
अतः भगवान के नाम पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखकर, हृदय के अंतःकरण से भाव-विह्वल होकर जैसे एक छोटा बालक अपनी माँ के लिए बिलखता है, उसी भाव से सदैव प्रभु के नाम का सुमिरन और जप करें।
कलियुग केवल नाम अधारा।
सुमिरि-सुमिरि नर उतरहिं पारा॥
