■ सूर्यकांत उपाध्याय

आजकल रिश्ते किसी बड़े तूफान से नहीं टूटते। वे छोटी-छोटी चुप्पियों, बढ़ते अहंकार और घटते अपनापन से धीरे-धीरे बिखर जाते हैं। ऐसे समय में शिकायत नहीं, दो मीठे बोल रिश्तों को संभाल लेते हैं।
शाम के सात बजे थे। फ्लैट का दरवाजा खुला और राहुल अंदर आए। चेहरे पर थकान थी, मन में खीझ। ब्रीफकेस सोफे पर रखकर वे चुपचाप कुर्सी पर बैठ गए जैसे बहुत कुछ कहना हो पर कहने का मन न हो।
किचन से चाय लाती सुमन ने उनकी उदासी तुरंत भाँप ली।
सुमन: “चाय तैयार है… आज दिन कुछ ज़्यादा भारी रहा क्या?”
राहुल (झुंझलाकर): “ऑफिस में सब गड़बड़ हो गया। किसी और की गलती का खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा। तुम क्या समझोगी, घर में रहकर बाहर की दुनिया कितनी मुश्किल है!”
ये शब्द सुमन के दिल में चुभ गए। वह जानती थी, यह गुस्सा उससे नहीं, हालात से है। पर रिश्तों में अक्सर गुस्सा सही जगह नहीं, सबसे आसान जगह पर निकलता है।
उस रात घर में खामोशी थी। बर्तनों की आवाज थी पर अपनापन नहीं।
दिन बीतते गए। राहुल का अहंकार और सुमन की चुप्पी, दोनों बढ़ते गए। यहाँ समस्या झगड़ा नहीं थी; समस्या थी, बात न करना, सुन न पाना और झुकने से इंकार।
एक शाम सुमन की सहेली नीलम आई।
नीलम: “तुम बहुत थकी हुई लग रही हो।”
सुमन: “थकान काम की नहीं, रिश्ते की है नीलम। राहुल बदल गए हैं। ऑफिस की टेंशन घर ले आते हैं और मुझ पर उतार देते हैं। लगता है जैसे अहंकार संवाद से बड़ा हो गया है, और प्यार कहीं पीछे छूट गया है।”
नीलम: “तुमने उनसे खुलकर कहा?”
सुमन: “कहा है… पर हर बार जवाब वही, ‘तुम्हें क्या पता कमाना कितना मुश्किल है।’ मैं समझती हूँ पर क्या रिश्ते सिर्फ कमाने से चलते हैं? आजकल लोग सही साबित होने में इतने उलझ जाते हैं कि रिश्ते बचाने का ख्याल ही नहीं रहता। इंसान भूखा हो तो सह लेता है, पर प्यार का भूखा इंसान भीतर से टूट जाता है।”
नीलम ने सुमन को गले लगा लिया।
नीलम: “आज रिश्ते इसलिए नहीं टूटते कि प्यार खत्म हो गया है बल्कि इसलिए कि दोनों ‘मैं’ से आगे ‘हम’ नहीं देख पाते। अगर तुम चाहती हो कि रिश्ता बचे, तो अहंकार नहीं अपनापन आगे रखना होगा।”
नीलम की बातों ने सुमन को सोचने पर मजबूर कर दिया। उसने तय किया, शिकायत नहीं, संवाद। तकरार नहीं, स्नेह। अगर अहंकार दीवार है तो उसे प्यार से गिराना होगा।
अगली शाम राहुल आए तो सवाल नहीं थे सिर्फ मुस्कान।
सुमन: “आपका ही इंतजार कर रही थी। आपकी पसंद की मसाला चाय और पकौड़े बनाए हैं।”
राहुल ठिठक गए। सुमन ने धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा।
सुमन: “मुझे आपकी मेहनत पर गर्व है। बस इतना चाहती हूँ कि घर को आप सुकून की जगह बनाए रखें। बाहर की लड़ाइयाँ दरवाजे पर छोड़ दीजिए… यहाँ जीत-हार नहीं, सिर्फ़ अपनापन है।”
फिर नरमी से बोली, “मुझे पैसों से ज्यादा आपके दो मीठे बोल चाहिए। कभी-कभी बस इतना पूछ लेना, ‘आज तुम कैसी हो?’ यही सवाल रिश्तों को जिंदा रखता है।”
राहुल की आँखें भर आईं। उन्होंने सुमन का हाथ थाम लिया।
राहुल: “मुझसे गलती हो गई। अहंकार और थकान में संवाद खो बैठा। माफ़ कर दो…”
फिर मुस्कुराकर बोले,“आज मेरी सुमन कैसी है?”
सुमन की आँखों में आँसू थे, इस बार दर्द के नहीं, राहत के। उस दिन के बाद राहुल समझ गए, रिश्ते जीतने के लिए नहीं, निभाने के लिए होते हैं। और रिश्ते बहस से नहीं, झुकने से बचते हैं। घर में फिर से मिठास लौट आई।
