
■ धीरज मिश्र
हिंदू सनातन परंपरा में पौष अमावस्या का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। पौष मास की यह अमावस्या पितरों की पूजा, पवित्र स्नान, दान-पुण्य और सूर्य देव की आराधना के लिए समर्पित मानी जाती है। इसे ‘छोटा पितृ पक्ष’ भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन किया गया तर्पण पितरों को विशेष रूप से प्रिय होता है।
शास्त्रों में विशेषकर गरुड़ पुराण में उल्लेख है कि अमावस्या के दिन विधिपूर्वक किया गया तर्पण और दान पितरों को शांति प्रदान करता है। उनके आशीर्वाद से परिवार में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि का वास बना रहता है। इसी कारण पौष अमावस्या पर आचरण और संयम का विशेष ध्यान रखने की परंपरा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन देर तक सोना अशुभ माना जाता है। ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान, दान और पूजा करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। पौष अमावस्या के दिन सात्विक जीवनशैली अपनाने पर विशेष बल दिया गया है। मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज जैसे तामसिक पदार्थों से दूरी बनाए रखना चाहिए। मदिरा सेवन इस दिन वर्जित माना गया है।
पितरों के नाम पर तर्पण या दान करते समय पूरी श्रद्धा और सावधानी रखनी चाहिए। किसी बुजुर्ग, निर्धन या असहाय व्यक्ति का अपमान करना इस दिन अशुभ फल देने वाला माना गया है। साथ ही झूठ बोलना, क्रोध करना या विवाद में पड़ना नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है, इसलिए इनसे बचना चाहिए।
पौष अमावस्या पर काले रंग के वस्त्र या वस्तुओं का प्रयोग भी वर्जित बताया गया है। मान्यता है कि काला रंग नकारात्मकता को आकर्षित करता है, इसलिए इस दिन हल्के और सात्विक रंगों का चयन शुभ रहता है।
इसके अतिरिक्त अमावस्या के दिन बाल और नाखून काटने से भी परहेज करने की परंपरा है। धार्मिक विश्वास है कि ऐसा करने से पितर अप्रसन्न होते हैं। कुल मिलाकर पौष अमावस्या संयम, श्रद्धा और सदाचार का दिन है, जो पितरों की कृपा से जीवन में सकारात्मकता लाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
