
● लखनऊ
पूर्वी उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के प्रागपुर गांव की आर्द्रभूमियों में रहने वाले सारस पक्षी अब किसान रामप्रीत की धुनों को पहचानने लगे हैं, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। वर्षों से रामप्रीत इन पक्षियों, उनके घोंसलों, अंडों और चूजों की निगरानी कर उन्हें सुरक्षित रखते आ रहे हैं। यह सोच उस किसान समुदाय में आए बड़े बदलाव का प्रतीक है, जो कभी सारस को गेहूं और धान की फसलों को नुकसान पहुंचाने वाला “उपद्रवी” मानता था।
असल में गलती पक्षियों की नहीं थी। आर्द्रभूमियों के सूखने और कृषि व बुनियादी ढांचे के विस्तार ने सारसों को मजबूरन जलभराव वाले खेतों में शरण लेने पर विवश किया, जो उनके प्राकृतिक आवास जैसे दिखते हैं। उत्तर प्रदेश की 95 प्रतिशत से अधिक आर्द्रभूमियां संरक्षित क्षेत्र से बाहर हैं और बहुत कम को ही 2017 के वेटलैंड नियमों के तहत अधिसूचित किया गया है। इसके बावजूद सारस ने खेतों और तालाबों में अपना घर ढूंढ लिया।

सारस अपनी ऊंचाई (करीब 152–156 सेमी), धूसर पंख, गुलाबी लंबे पैर और लाल सिर-गर्दन के कारण आसानी से पहचाने जाते हैं। यह उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी और भारत में प्रजनन करने वाला एकमात्र स्थायी क्रेन है। लेकिन इनकी संख्या घटकर लगभग 15–20 हज़ार रह जाने से चिंता बढ़ी और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने संरक्षण योजना शुरू की। आर्द्रभूमियों के विनाश और फसल चक्र में बदलाव के कारण इन्हें IUCN ने ‘असुरक्षित’ श्रेणी में रखा है। खासकर तराई क्षेत्र में बहु-प्रजातीय घासभूमि के स्थान पर गन्ने की एकल खेती ने इनके आवास सिमटा दिए।
इस चुनौती के बीच ‘सारस हैबिटेट सिक्योरमेंट प्रोजेक्ट’ आशा की किरण बना। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, उत्तर प्रदेश वन विभाग और टाटा ट्रस्ट्स के सहयोग से चल रही इस पहल में पूर्वी उत्तर प्रदेश के 10 जिलों की लगभग 100 आर्द्रभूमियों की पहचान की गई, जहां सारस पाए जाते हैं। किसानों को संरक्षण समितियों से जोड़कर उन्हें ‘सारस मित्र’ बनाया गया। उन्हें समझाया गया कि सारस मिट्टी को भुरभुरा करता है, हानिकारक कीट खाता है और खेत के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेतक है।
आज स्कूलों, गांव बैठकों और निगरानी अभियानों से सोच बदली है। सारस जनगणना के अनुसार इन जिलों में 2,878 सारस दर्ज किए गए हैं और इस प्रजनन मौसम में 237 घोंसलों की सुरक्षा हुई है। अब किसान सारस को समस्या नहीं बल्कि गर्व और उत्सव का विषय मानने लगे हैं, पूर्वी उत्तर प्रदेश में संरक्षण की यह साझी यात्रा सारस की सुरक्षित उड़ान का संकेत देती है।
(साभार:बेटर इंडिया)
