
● मुंबई।
मुंबई के केशव गोरे ट्रस्ट सभागार में सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ के दूसरे दौर का 27वां मासिक आयोजन मोहन राकेश के शताब्दी वर्ष को समर्पित रहा। प्रमुख वक्तव्य में डॉ. दयानंद तिवारी ने मोहन राकेश को अपने समय का निर्भीक और प्रासंगिक रचनाकार बताया। उन्होंने राकेश द्वारा प्राध्यापक की नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक लेखन अपनाने, साहित्य की सभी विधाओं में उनके योगदान और ‘मलबे का मालिक’ जैसी कहानियों की आज की सामाजिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। नाट्य परंपरा में भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद के बाद उन्हें आधुनिक हिंदी नाटक का सशक्त स्तंभ बताया गया।
कवि व विचारक डॉ. अनिल गौड़ ने मोहन राकेश की रचनात्मक चेतना, जीवन-संघर्ष और करुणा-बोध पर विस्तार से बात की। उन्होंने ‘गिरगिट का सपना’, ‘सीमाएं’, ‘उसकी रोटी’ और ‘मलबे का मालिक’ का उल्लेख करते हुए कहा कि राकेश का साहित्य बाह्य और आंतरिक यथार्थ, दोनों को गहराई से पकड़ता है। पिता के निधन के बाद की पारिवारिक त्रासदी को उन्होंने राकेश की मूल संवेदना का स्रोत बताया। साथ ही ‘मृच्छकटिकम्’ और ‘शाकुन्तलम्’ जैसे अनुवादों के संदर्भ में उनके साहित्यिक आधार को रेखांकित किया।
कवि रासबिहारी पांडेय ने ‘लहरों के राजहंस’ के माध्यम से लौकिक सुख और आध्यात्मिक शांति के द्वंद्व को रेखांकित किया। प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने मोहन राकेश के नाटकों में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता और भोगवादी मानसिकता पर तीखे सवाल उठाए।
प्रकाशक व कवि रमन मिश्र ने मणि कौल निर्देशित ‘आषाढ़ का एक दिन’ फ़िल्म के सिनेमाई शिल्प, के.के. महाजन के छायांकन और प्रयोगधर्मिता पर चर्चा की। प्रज्ञा मिश्र ने ‘गिरगिट का सपना’ का प्रभावी पाठ किया। रंगकर्मी दिनेश कुमार ने रवींद्र कालिया की भूमिका, आलोक शुक्ला ने राजेंद्र यादव को लिखा मोहन राकेश का पत्र प्रस्तुत किया। सौरभ बंसल ने कविता-पाठ किया।
निधि मिश्र और सुशील बौंठियाल ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ से जुड़े अनुभव साझा किए। विजयकुमार ने ‘आधे अधूरे’ का अंश प्रस्तुत किया जबकि प्रमोद सचान ने प्रतिमा सिन्हा, मधुबाला शुक्ला और सौरभ बंसल के साथ ‘आषाढ़ का एक दिन’ के पात्रों को जीवंत किया।
कार्यक्रम का संचालन विजय पंडित ने किया, जिन्होंने मोहन राकेश की भारतीय आधुनिकता की समझ पर सारगर्भित टिप्पणी की।
