■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक ग्रामीण था भोला, अनपढ़ पर मन में सीखने की तीव्र इच्छा लिए हुए। वह अक्सर देखता कि गाँव में पढ़े-लिखे लोग अख़बार या किताब पढ़ते समय चश्मा पहनते हैं।
उसे लगता, “पढ़ने का जादू निश्चित ही इसी चश्मे में है।” और सोचता, “अगर मेरे पास भी ऐसा चश्मा हो, तो मैं भी सबकी तरह पढ़ सकूँगा।”
एक दिन उसने हिम्मत जुटाई और शहर की एक चश्मे की दुकान पर पहुँच गया। दुकानदार ने विनम्रता से पूछा, “कैसा चश्मा चाहिए?”
ग्रामीण ने आत्मविश्वास से कहा, “मुझे वह चश्मा दीजिए जिससे मैं किताब पढ़ सकूँ।”
दुकानदार ने उसे किताब दी और कई चश्मे सामने रख दिए। ग्रामीण एक-एक करके चश्मा लगाता, आँखें सिकोड़ता, सिर हिलाता पर न अक्षर समझ में आए, न कोई अंतर दिखाई दिया।
कुछ देर बाद वह झुँझलाकर बोला, “तुम्हारे कोई भी चश्मे काम के नहीं! एक भी पढ़ने लायक नहीं!”
दुकानदार ने देखा, ग्रामीण किताब उल्टी पकड़े हुए था। मुस्कुराते हुए उसने कहा,
“भाई, चश्मा दुनिया दिखाता है, लेकिन पढ़ना… वह तो सीख से आता है।”
ग्रामीण को तब समझ आया। गलती चश्मे में नहीं, उसकी अपनी अज्ञानता में थी। जो क्षमता भीतर से विकसित होनी चाहिए, वह बाहर ढूँढी जा रही थी।
सीख: अज्ञानता किसी साधन से नहीं मिटती, उसका नाश केवल ज्ञान की रोशनी करती है।
