■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन नारद मुनि आकाश मार्ग से “नारायण–नारायण” का जप करते हुए जा रहे थे। तभी उनके मस्तिष्क में एक विचित्र प्रश्न उठा। उसी शंका के समाधान हेतु वे ब्रह्मलोक पहुँचे।
ब्रह्मलोक पहुँचकर नारद मुनि ने अपने पूज्य पिता ब्रह्मा जी को दण्डवत प्रणाम किया। नारद को सामने देखकर ब्रह्मा जी बोले, “कहो पुत्र! आज यहाँ कैसे आना हुआ? तुम्हारे मुख के भाव कुछ और ही संकेत दे रहे हैं। कोई विशेष प्रयोजन अथवा समस्या है क्या?”
नारद जी ने विनम्रतापूर्वक कहा, “पिताश्री, कोई विशेष प्रयोजन तो नहीं है, किंतु एक प्रश्न मन में खटक रहा है। उसी का उत्तर जानने के लिए आपकी शरण में आया हूँ।”
ब्रह्मा जी बोले, “तो फिर विलंब कैसा? मन की शंकाओं का समाधान शीघ्र कर लेना ही उचित है। निःसंकोच अपना प्रश्न पूछो।”
नारद मुनि बोले, “पिताश्री, आप समस्त सृष्टि के परमपिता हैं। देवता और दानव दोनों आपकी ही संतान हैं। भक्ति और ज्ञान में देव श्रेष्ठ हैं तो शक्ति और तपस्या में दानव अग्रणी माने जाते हैं। पर मेरा प्रश्न यह है कि इन दोनों में वास्तव में कौन श्रेष्ठ है? और आपने देवों को स्वर्ग तथा दानवों को पाताल लोक क्यों प्रदान किया?”
नारद का प्रश्न सुनकर ब्रह्मदेव बोले, “नारद, इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए कठिन है। देव और दानव दोनों ही मेरे पुत्र हैं और अपने ही दो पुत्रों की तुलना करना मेरे लिए उचित नहीं। परंतु तुम्हारे प्रश्न के समाधान में भगवान शिव अवश्य सहायता कर सकते हैं।”
ब्रह्मदेव की आज्ञा लेकर नारद मुनि भगवान शिव के पास पहुँचे और अपनी शंका उनके समक्ष रखी। महादेव नारद को देखकर मुस्कुराए और बोले, “तुम देवों और दानवों के लिए एक भोज का आयोजन करो और दोनों को आमंत्रित करो।”
महादेव की आज्ञा का पालन करते हुए नारद मुनि ने भोज की व्यवस्था की। अगले दिन स्वयं भगवान शिव भी नारद के आश्रम में अतिथि-सत्कार हेतु पधारे।
दानव भोजन का आनंद लेने सबसे पहले पहुँच गए। पहले आने के कारण उन्होंने आग्रह किया कि भोजन की शुरुआत वे ही करें। थालियाँ परोसी गईं। दानव भोजन करने बैठे ही थे कि तभी भगवान शिव अपने हाथों में कुछ लकड़ियाँ लेकर उनके सामने आए और बोले, “आज भोजन की एक छोटी-सी शर्त है। मैं प्रत्येक अतिथि के दोनों हाथों में इस प्रकार लकड़ियाँ बाँधूँगा कि वे कोहनी से मुड़ न सकें। इसी अवस्था में सभी को भोजन करना होगा।”
कुछ ही देर में सभी दानवों के हाथों में लकड़ियाँ बँध चुकी थीं। उन्होंने भोजन का प्रयास किया परंतु उस स्थिति में खाना असंभव था। कोई थाली में मुँह डालने लगा तो कोई भोजन उछालकर मुँह में डालने का प्रयास करने लगा। यह दृश्य देखकर नारद मुनि अपनी हँसी रोक न सके।
सारे प्रयास निष्फल होने पर दानव बिना खाए ही उठ गए और क्रोधित होकर बोले,“यदि हमारी यही दशा करनी थी तो हमें भोज पर बुलाया ही क्यों? जब देव आएँ, तो उनके हाथों में भी ऐसी ही लकड़ियाँ बाँधना, ताकि हम भी उनकी दुर्दशा का आनंद ले सकें।”
कुछ समय बाद देव भी वहाँ पहुँचे। भोजन मंत्रोच्चार के साथ जैसे ही वे बैठे, महादेव शिव ने उनके हाथों में भी लकड़ियाँ बाँध दीं और वही शर्त रखी।
हाथ बँधने पर भी देव शांत रहे। वे समझ गए कि स्वयं भोजन करना संभव नहीं है। अतः वे थोड़ा आगे खिसक गए और थाली से अन्न उठाकर सामने बैठे देव को खिलाने लगे। परस्पर स्नेह और सहयोग के साथ वे एक-दूसरे को भोजन कराते रहे और आनंदपूर्वक भोजन किया। उन्होंने न केवल भोजन का स्वाद लिया बल्कि परस्पर प्रेम और सम्मान भी प्रकट किया।
यह दृश्य देखकर दानव अत्यंत दुखी हो गए, उन्हें यह सरल युक्ति क्यों न सूझी? नारद मुनि यह सब देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
नारद जी ने भगवान शिव से कहा, “हे देवों के देव! आपकी लीला अगाध है। युक्ति, शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग स्वार्थ के बजाय परमार्थ के लिए करने वाला ही वास्तव में श्रेष्ठ होता है। दूसरों की भलाई में ही अपनी भलाई निहित है, यह आपने प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध कर दिया। आज मेरी समस्त शंकाओं का समाधान हो गया।”
