■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक घर में माँ और बेटी रहती थीं। रात का समय था। अचानक दरवाजे पर खटखटाने की आवाज आई। माँ और बेटी बहुत गरीब थीं और एक छोटे से घर में रहती थीं। बेटी ने दरवाजा खोला तो वहाँ कोई नहीं था। नीचे देखा तो एक चिट्ठी पड़ी हुई थी।
बेटी ने चिट्ठी खोलकर पढ़ी, तो उसके हाथ काँपने लगे और वह ज़ोर से चिल्लाई, “माँ, इधर आओ!”
चिट्ठी में लिखा था, “बेटी, मैं तुम्हारे घर आऊँगा, तुमसे और तुम्हारी माँ से मिलने।”
नाम की जगह नीचे लिखा था, भगवान।
माँ ने कहा, “यह शायद हमारी गली के किसी लड़के की शरारत है, जो तुम्हें छेड़ने के लिए ऐसी गंदी हरकत कर रहा है।” लेकिन बेटी को माँ की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह बोली, “माँ, पता नहीं क्यों, मुझे यह सच लग रहा है।”
माँ को मनाकर बेटी और माँ दोनों तैयारी में लग गईं। घर भले ही छोटा था, लेकिन दिल बहुत अमीर थे।
घर में मेहमानों के लिए केवल एक चटाई थी। उसे निकालकर बिछा दिया। रसोई में जाकर देखा तो खाने का एक दाना भी नहीं था।
दोनों गहरी सोच में पड़ गईं कि यदि भगवान सच में आ गए, तो उन्हें खाने में क्या देंगी?
आगे-पीछे कुछ सोचे बिना बेटी ने अपनी बचत के 300 रुपये निकाले। वह छाता और कंबल लेकर किराने की दुकान के लिए निकल पड़ी। बारिश होने वाली थी और ठंड भी बहुत ज्यादा थी।
उसने एक पैकेट दूध, एक मिठाई का डिब्बा और कुल 200 रुपये की चीजें खरीदीं और घर की ओर लौट चली। उन्हें लगा, शायद भगवान घर पहुँच गए होंगे।
घर से थोड़ी दूरी पर पहुँची ही थी कि जोरदार बारिश शुरू हो गई। सड़क किनारे एक पति-पत्नी खड़े थे। उनके हाथ में एक छोटा बच्चा था, जो रो रहा था। स्थिति ठीक नहीं लग रही थी। बच्चा तेज बुखार में तप रहा था और उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था।
एक ओर भगवान के घर आने की बात थी और दूसरी ओर यह संकट। बेटी ने सोचा, भगवान को तो मना लिया जाएगा, लेकिन यदि इन लोगों को इस हाल में छोड़ दिया तो भगवान कभी माफ़ नहीं करेंगे।
बेटी ने जो-जो सामान खरीदा था, सब उनके हाथ में थमा दिया। इतना ही नहीं, बचे हुए पचास रुपये भी दे दिए और कहा, “मेरे पास अभी इतना ही है, कृपया रख लीजिए।”
बारिश हो रही थी, इसलिए छाता भी दे दिया और बच्चे को ठंड न लगे, इसीलिए कंबल भी।
फिर वह फटाफट घर पहुँची, यह सोचकर कि भगवान आ गए होंगे। दरवाजे पर माँ खड़ी थीं। बोलीं, “आने में इतनी देर क्यों लगा दी, बेटी?”
इतना कहते हुए उन्होंने बताया, “और देखो, एक और चिट्ठी आई है।”
बेटी ने चिट्ठी पढ़नी शुरू की। उसमें लिखा था “बेटी, आज तुमसे मिलकर बहुत खुशी हुई।
पहले से दुबली हो गई हो, लेकिन आज भी उतनी ही सुंदर हो।
मिठाई बहुत अच्छी थी और तुम्हारे दिए हुए कंबल से बहुत आराम मिला।
छाता देने के लिए धन्यवाद, बेटी।
अगली बार मिलते ही लौटा दूँगा।”
बेटी के तो होश उड़ गए। वह निशब्द होकर पीछे मुड़ी और सड़क किनारे देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
चिट्ठी में आगे लिखा था, “इधर-उधर मत ढूँढो मुझे। मैं तो कण-कण में हूँ।
जहाँ पवित्र सोच होती है, मैं हर उस मन में हूँ।
यदि कोई ज़रूरतमंद दिखे, तो समझ लेना, मैं उसी में हूँ।”
बेटी रो पड़ी और उसने माँ को सब कुछ बता दिया। दोनों बहुत भावुक हो गईं और पूरी रात सो नहीं पाईं।
दोस्तों, पैसों से अमीर हों या न हों,
लेकिन कर्मों से अमीर ज़रूर बनें।
