■ सूर्यकांत उपाध्याय

बहुत प्राचीन बात है। किसी गाँव में एक बुजुर्ग महात्मा रहते थे। दूर-दूर से लोग शिक्षा ग्रहण करने के लिए अपने बच्चों को उनके आश्रम में भेजते थे। एक दिन महात्मा जी के पास कमल नाम का एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति आया।
“गुरु जी! मुझे अपने श्रीचरणों में स्थान दें। अब मेरी कोई कामना बाकी नहीं रही है। मैं आश्रम में रहकर आपके आज्ञानुसार समाज को अभी तक प्राप्त ज्ञान वितरित करना चाहता हूँ।”
पारखी वृद्ध महात्मा ने तुरंत समझ लिया कि यह व्यक्ति योग्य है, उसकी कामना सच्ची है और वह समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाने के लिए कृतसंकल्पित है।
कमल उनके चरणों में गिरकर प्रार्थना कर रहा था।
महात्मा जी ने कहा, “पुत्र! आश्रम की परम्परा है कि पहले तुम स्नान करके पवित्र हो और भगवान के सामने संकल्प करो कि अपना कर्तव्य सही तरीके से निभाओगे। अतः कल प्रातः स्नान करके आश्रम आ जाना।”
कमल के जाते ही वृद्ध महात्मा ने सफाई करने वाली महिला को बुलाया और कहा, “कल सुबह यह नया शिक्षक आएगा। जैसे ही वह आश्रम के पास पहुँचे, तुम झाड़ू इस प्रकार चलाना कि उसके चेहरे पर थोड़ी धूल गिर जाए। परंतु सावधानी रखो, वह तुम्हें चोट नहीं पहुँचाएगा।” महिला महात्मा जी की बहुत सम्मान करती थी और उसने आज्ञा सहर्ष स्वीकार कर ली।
अगले दिन कमल नहा-धोकर इठलाता हुआ आश्रम आया। जैसे ही वह नजदीक पहुँचा, महिला ने तेजी से झाड़ू चलाना शुरू किया। कमल के चेहरे पर धूल चढ़ गई और उसका क्रोध उफान पर आ गया। पास पड़ी पत्थर उठाकर वह महिला को मारने के लिए दौड़ा, लेकिन महिला पहले से सावधान थी और झाड़ू फैंकते हुए वहाँ से भाग गई।
कमल घर लौट गया, दुबारा स्नान किया और महात्मा के पास पहुँचा।
महात्मा जी ने कहा, “अभी तो तुम जानवरों की भांति लड़ने-चिल्लाने के लिए दौड़ते हो। तुम्हारा शिक्षण अभी संभव नहीं। एक वर्ष बाद आना, तब तक अपने वर्तमान कार्य करते रहो।”
कमल की इच्छा सच्ची थी और उसकी महात्मा में श्रद्धा भी। वर्ष पूरा होने पर वह फिर महात्मा जी के पास गया।
महात्मा जी ने कहा, “पुत्र! कल प्रातः स्नान करके आना।”
कमल के जाते ही महात्मा जी ने सफाई कर्मचारी को बुलाकर कहा, “इस बार मार्ग में झाड़ू इस तरह से चलाना कि धूल के साथ हल्की चोट भी लगे। डरना मत, वह तुम्हें चोट नहीं पहुँचाएगा।”
अगले दिन स्नान-ध्यान करके कमल द्वार तक पहुँचा। महिला ने आदेशानुसार झाड़ू चलाकर धूल और हल्की चोट दी। कमल को क्रोध आया, पर उसने झगड़ा नहीं किया। केवल गालियाँ दीं और फिर घर जाकर स्नान किया।
महात्मा जी ने कहा, “तुम्हारी काबिलियत में मुझे संदेह है। एक वर्ष और प्रतीक्षा करो।”
एक वर्ष बाद कमल स्नान-ध्यान करके महात्मा जी के पास आया। इस बार महात्मा जी ने महिला को कहा, “स्नान करके आने पर अपनी कचरे की टोकरी उस पर उड़ा देना।”
महिला डर गई, पर महात्मा जी ने आश्वासन दिया कि वह कुछ नहीं कहेगा।
सुबह कमल आश्रम पहुँचा। महिला ने आदेशानुसार कचरा उसकी ओर उड़ा दिया। पर कमल न तो क्रोधित हुआ और न मार-पीट करने के लिए दौड़ा।
कमल ने कहा, “माता! आप मेरी गुरु हैं।”
महात्मा जी के सामने मस्तक झुकाकर उसने कहा, “आपने मेरे मूर्ख-अभिमानी स्वभाव और क्रोध-रूपी शत्रु पर विजय पाने में मेरी सहायता की।”
कमल ने स्नान करके आश्रम में उपस्थिति दर्ज कराई।
महात्मा जी ने उसे गले लगाकर कहा, “पुत्र! तुमने अपने क्रोध पर काबू पा लिया है। अब तुम आश्रम में कार्य करने के सच्चे अधिकारी हो।”
