
मुज़फ़्फ़रपुर@बिहार
प्रेममूर्ति पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज के व्यासत्व और हरियाणा सेवा संस्था के आयोजकत्व में पानी टंकी चौक स्थित जनता कॉलेज परिसर में चल रही नौ दिवसीय रामकथा के दौरान श्रोताओं को संबोधित करते हुए प्रेमभूषण महाराज ने निवेदन किया कि संस्कारी व्यक्ति ही शांत रह सकता है। स्वयं की प्रेरणा से शासन को मानना ही अनुशासन है। आनंद का गुणधर्म है कि वह बिखरता और फैलता है।
प्रेममूर्ति प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि मनुष्य का स्वभाव है कि वह न तो भूतकाल से सीखता है और न ही भविष्य की चिंता करता है, वह केवल वर्तमान में जीता है। मिथिला के वाटिका प्रसंग का गायन करते हुए उन्होंने कहा कि पूजा में भाव और शक्ति होती है। पूजा में हमारी भावनिष्ठा के अनुसार ही भगवान करुणा और कृपा प्रदान करते हैं, इसलिए पूजन के समय कभी भी शीघ्रता नहीं करनी चाहिए।
प्रेम के भाव को प्रकाशित करते हुए प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि कोई भी अपने प्रेम को खोना नहीं चाहता, इसलिए प्रेम सदैव संशययुक्त रहता है। अतः जिसके प्रति अत्यधिक प्रेम होता है, उसके प्रति संशय होना स्वाभाविक है। प्रेममूर्ति पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज ने चक्रवर्ती राजा दशरथ और विदेहराज जनक की प्रशंसा करते हुए कहा कि दशरथ जी और जनक जी दोनों रामजी में ही निवास करते हैं, दोनों समधियों में यही साम्य है।

मिथिला भूमि पर वाटिका, धनुष यज्ञ तथा विवाह प्रसंग का सुमधुर गायन करते हुए प्रेममूर्ति पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज ने “ले ला सुमन भर दोना”, “गौरी दरबार चला हो सखी पूजि आयी”, “राम को देखकर जनक नंदिनी”, “सियाजू के हाथ जयमाल हो”, “अवध नगरिया से चलली बरतिया” जैसे मांगलिक गीतों की प्रस्तुति दी। इन प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मिथिला के विवाहोत्सव भाव में पूरी तरह सराबोर कर दिया। कथा पंडाल में स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों का समूह झूमता, थिरकता और नाचता नज़र आया।
उल्लेखनीय है कि प्रेममूर्ति पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज की 32 वर्षीय रामकथा गायन यात्रा में विश्वभर में फैले रामकथा श्रोताओं के बीच उनकी भजनात्मक रामकथा के प्रति प्रियता, भक्ति और उत्साह कभी कम नहीं हुआ। विशेष रूप से उनके प्रमुख संगीत सारथी, सुप्रसिद्ध तबला वादक सियालाडली शरण (भाई जी) की संगत में धनुषभंग प्रसंग की अद्भुत और रोमांचकारी प्रस्तुति आज भी रामकथा गायन क्षेत्र में अद्वितीय मानी जाती है।
