
खारघर @नवी मुंबई
प्रख्यात कथाकार धर्मगुरु देवकीनंदन ठाकुर महाराज ने कहा है कि जीवन में मनुष्य को सदैव धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए, क्योंकि यही एकमात्र ऐसा सत्य है जो अंतिम समय में भी हमारे साथ जाता है। धन, वैभव, पद, प्रतिष्ठा, रिश्ते और सांसारिक सुख–सुविधाएँ सब यहीं छूट जाती हैं । अंतिम समय में न तो धन काम आता है, न ही सत्ता और न ही शरीर की शक्ति। उस क्षण केवल धर्म से अर्जित पुण्य ही सहारा बनता है।
महाराजश्री यहां नवी मुंबई के खारघर स्थित कॉरपोरेट पार्क ग्राउंड में आयोजित शिव महापुराण कथा के षष्ठम दिवस पर पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शिव भक्ति के माध्यम से धर्म, धार्मिक आचरण, श्रेष्ठ संस्कार, उत्तम स्वास्थ्य एवं सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर भक्तों को प्रेरणादायी मार्गदर्शन प्रदान किया।
● सौभाग्यवान ही श्रवण कर पाते हैं शिवमहापुराण कथा
शिवमहापुराण कथा को सुनने का सौभाग्य हर किसी को सहज रूप से प्राप्त नहीं होता। यह अवसर केवल उन्हें ही मिलता है, जिनके पूर्वजन्मों के कर्म अच्छे होते हैं। शिवमहापुराण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भगवान शिव के स्वरूप, लीला, करुणा और कल्याणकारी शक्ति का जीवंत दर्शन है। इसे सुनना आत्मा के भीतर छिपे अज्ञान, अहंकार और विकारों को नष्ट करता है।
● मास की दोनों एकादशी का व्रत अवश्य करें
हर माता- पिता को स्वयं और अपने बच्चों के साथ 2 एकादशी का व्रत जरूर रखना चाहिए । एकादशी व्रत बच्चों को संयम, अनुशासन, धैर्य और इंद्रिय-निग्रह सिखाता है। यह उन्हें यह समझने में मदद करता है कि जीवन केवल भोग का नाम नहीं, बल्कि आत्मसंयम और संतुलन भी उतना ही आवश्यक है।

● शिवलिंग पर जल अर्पण सदैव अपने घर के लोटे से करें
शिव जी पर जल सदैव अपने घर के लोटे से ही चढ़ाना चाहिए। जब हम अपने घर से जल लेकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं, तो उसमें केवल जल नहीं होता, बल्कि हमारे घर की ऊर्जा, हमारी श्रद्धा, हमारे संस्कार और हमारी भावना भी सम्मिलित होती है। घर का लोटा व्यक्ति के जीवन, परिवार और आत्मा से जुड़ा होता है। ऐसे में उस लोटे से चढ़ाया गया जल सीधे भगवान शिव तक हमारी भावनाओं को पहुंचाता है।
●जीवन का नियम: सुख और दुख का क्रम
मनुष्य का जीवन सुख और दुख के चक्र से होकर गुजरता है, किंतु बुद्धिमान वही है जो सुख के समय धर्मपरायण रहता है। अक्सर देखा जाता है कि जब जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता आती है, तब व्यक्ति अहंकार, भोग और लापरवाही में धर्म को भूलने लगता है। सुख के समय किया गया धर्म ही दुख के समय हमारी ढाल बनता है।
● धर्म के अभाव के कारण टूट रहे परिवार
आज समाज में परिवारों के टूटने का सबसे बड़ा कारण धर्म और संस्कारों का अभाव है। धर्म हमें यह सिखाता है कि माता-पिता, दादा-दादी, पति-पत्नी और बच्चों के प्रति हमारे क्या कर्तव्य हैं। जब यह कर्तव्यबोध समाप्त हो जाता है, तब घर में संवाद कम और टकराव अधिक हो जाता है। जब परिवार में प्रार्थना, सत्संग, व्रत-त्योहार और संस्कारों की परंपरा होती है, तो घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। बच्चे बड़ों का सम्मान करना सीखते हैं और बड़ों में त्याग की भावना बनी रहती है।
