
■ सूर्यकांत उपाध्याय
प्राचीन काल की बात है। देवताओं और असुरों के बीच भीषण युद्ध चल रहा था। असुरों के अत्याचार दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे थे। देवता बार-बार युद्ध में पराजित हो रहे थे और स्वर्गलोक पर संकट छा गया था। अंततः सभी देवता महादेव की शरण में गए और उनसे रक्षा की प्रार्थना की।
भगवान शिव ने देवगणों की पुकार सुनकर अपनी आँखें बंद कीं और गहन ध्यान में लीन हो गए। जब उनके तप की ऊर्जा चरम पर पहुँची, तभी उनकी दिव्य शक्तियों से एक तेजस्वी अस्त्र प्रकट हुआ त्रिशूल।
यह कोई साधारण अस्त्र नहीं था।
त्रिशूल के तीन मुख तीन महान शक्तियों के प्रतीक बने-
- सृजन (ब्रह्मा शक्ति)
- पालन (विष्णु शक्ति)
- संहार (शिव शक्ति)
इस प्रकार त्रिशूल में त्रिदेवों की संयुक्त शक्ति समाहित हो गई।
महादेव ने जैसे ही त्रिशूल को अपने हाथ में धारण किया, सम्पूर्ण ब्रह्मांड में अपार तेज फैल गया।
जब असुरों ने देवताओं पर पुनः आक्रमण किया, तब भगवान शिव स्वयं रणभूमि में उतरे। असुरों की विशाल सेनाएँ, तलवारें और रथ सब कुछ शिव के त्रिशूल के सामने टिक न सका।
जैसे ही महादेव ने त्रिशूल घुमाया, उसकी अग्निमयी शक्ति से असुरों की सेना काँप उठी।
मुख्य असुर अपने सामर्थ्य पर घमंड कर रहा था पर महादेव ने उसके अहंकार को क्रमशः तीन प्रहारों में समाप्त कर दिया-
पहला प्रहार – उसके अहंकार को चूर कर गया
दूसरा प्रहार – उसके अधर्म का नाश कर गया
तीसरा प्रहार – उसके अत्याचार का अंत कर गया
देवता सुरक्षित हो गए और ब्रह्मांड में पुनः धर्म की स्थापना हुई।
शिव का त्रिशूल केवल एक शस्त्र नहीं बल्कि जीवन का गहन संदेश भी देता है।
- भूत, वर्तमान और भविष्य पर महादेव का अधिकार
- सत्त्व, रजस और तमस पर उनकी सत्ता
- जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र का संचालन उन्हीं के हाथों में है
इसी कारण शिव का त्रिशूल संसार का सबसे शक्तिशाली और पवित्र अस्त्र माना जाता है।
