■ सूर्यकांत उपाध्याय

उन चारों को होटल में बैठा देख रमेश हड़बड़ा गया। लगभग 25 सालों बाद वे फिर उसके सामने थे। अब वे बहुत बड़े और संपन्न आदमी हो गए थे।
रमेश को अपने स्कूल के दोस्तों का खाने का ऑर्डर लेकर परोसते समय बड़ा अटपटा लग रहा था। उनमें से दो मोबाइल फोन पर व्यस्त थे और दो लैपटॉप पर।
रमेश पढ़ाई पूरी नहीं कर पाया था। उन्होंने उसे पहचानने का प्रयास भी नहीं किया। वे खाना खाकर बिल चुका कर चले गए।
रमेश को लगा कि उन चारों ने शायद उसे पहचाना नहीं या उसकी गरीबी देखकर जानबूझकर पहचानने की कोशिश नहीं की।
उसने एक गहरी, लंबी साँस ली और टेबल साफ करने लगा। टिश्यू पेपर उठाकर कचरे में डालने ही वाला था,
शायद उन्होंने उस पर कुछ जोड़-घटाया था।
अचानक उसकी नजर उस पर लिखे हुए शब्दों पर पड़ी।
लिखा था- “अबे साले, तू हमें खाना खिला रहा था तो तुझे क्या लगा, तुझे हम पहचानेंगे नहीं?
अबे, 20 साल क्या, अगर अगले जन्म बाद भी मिलता तो तुझे पहचान लेते।
तुझे टिप देने की हिम्मत हममें नहीं थी।
हमने पास ही फैक्ट्री के लिए जगह खरीदी है और अब हमारा इधर आना-जाना लगा ही रहेगा।
आज तेरा इस होटल का आखिरी दिन है।
हमारी फैक्ट्री की कैंटीन कौन चलाएगा बे?
तू चलाएगा ना!
तुझसे अच्छा पार्टनर और कहाँ मिलेगा!
याद हैं न स्कूल के दिन-हम पाँचों एक-दूसरे का टिफ़िन खा जाते थे।
आज के बाद रोटी भी मिल-बाँटकर साथ-साथ खाएँगे।”
रमेश की आँखें भर आईं।
सच्चे दोस्त वही होते हैं, जो दोस्त की कमजोरी नहीं, सिर्फ दोस्त को देखकर ही खुश हो जाते हैं।
धीरज, धर्म, मित्र, अरु नारी।
आपद काले परखिए चारी।।
