
■ सूर्यकांत उपाध्याय
एक भक्त जोगा परमानंद थे, जिन्हें नित्य-नियम पालन से ही भगवत्प्राप्ति हुई। नित्य-नियम का कठोर पालन करने वाले जोगा परमानंद, पंढरीनाथ (पाण्डुरंग, विट्ठल, श्रीकृष्ण) के एक महान भक्त हुए हैं, जिनका जीवन-चरित्र अत्यंत प्रेरणादायक है।
पुराने समय में दक्षिण भारत के वाशी नगर में जोगा परमानंद हुए। बचपन में ही उन्हें पीताम्बरधारी, वनमाली श्रीहरि के दर्शन हो गए थे। जोगा को परमानंद रूपी अमृत मिल चुका था; इसलिए वे रात-दिन ‘राम-कृष्ण-हरि’ जपते रहते। सांसारिक विषयों के पीछे भागने वाले लोग उन्हें पागल कहते थे।
थोड़ा बड़ा होने पर वे पंढरपुर आ गए। उनका नित्य नियम था कि वे पहले पंढरीनाथ का षोडशोपचार पूजन करते और फिर गीता का एक श्लोक पढ़कर साष्टांग नमस्कार करते।
इस प्रकार वे गीता के सात सौ श्लोक पढ़कर पंढरीनाथ को सात सौ बार साष्टांग नमस्कार करते थे। जब तक यह नियम पूरा नहीं हो जाता था, तब तक वे अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करते थे।
गर्मी हो या सर्दी, बारिश हो या पत्थर-जोगा के नेत्रों के सामने पंढरीनाथ का श्रीविग्रह रहता, हृदय में उनका ध्यान, मुख में गीता के श्लोक और सारा शरीर साष्टांग दण्डवत् करने में लगा रहता।
ज्येष्ठ मास में जब पृथ्वी तवे-सी गर्म होती या पौष मास में बर्फ-सी ठंड पड़ती या वर्षा में कीचड़ फैल जाता, जोगा की साष्टांग दण्डवत् चलती रहती। लोग उन्हें ‘गीता दण्डवती भक्त’ कहते थे।
एक बार जब वे पंढरीनाथ के मंदिर के महाद्वार पर गीता के श्लोक बोलते हुए सात सौ बार साष्टांग नमस्कार कर रहे थे, वहां एक व्यापारी आया।
व्यापारी ने देखा कि जोगा का शरीर कीचड़ से सन गया था क्योंकि रात की बारिश से महाद्वार के पास कीचड़ हो गया था। व्यापारी जोगाजी की कष्ट सहन करने की शक्ति और भक्ति देखकर श्रद्धावान् हो गया। उसने पास की दुकान से एक सुंदर पीताम्बर खरीदकर जोगा को देने की कोशिश की।
जोगा ने कहा- ‘भाई! यदि तुम्हें मुझ पर दया आती है तो कोई फटा-पुराना वस्त्र दे दो। यह पीताम्बर तो भगवान पंढरीनाथ को ही सुशोभित करता है, उन्हें ही चढ़ाओ।’
व्यापारी नहीं माना। अत्यधिक आग्रह पर जोगा ने वह पीताम्बर ले लिया। अगले दिन जोगा पीताम्बर पहनकर पंढरीनाथ को साष्टांग नमस्कार करने लगे।
लेकिन आज जोगा का मन रेशमी पीताम्बर के मोह में पड़ गया। वे बार-बार पीताम्बर को कीचड़ से बचाने में लगे रहे, इसलिए दोपहर तक अपना नित्य नियम पूरा नहीं कर सके।
भक्ति मार्ग में दयामय भगवान अपने भक्त की रक्षा उसी प्रकार करते हैं, जैसे स्नेहमयी मां अपने अबोध शिशु की करती है। जो अपने को श्रीहरि के चरणों में अर्पित कर चुका है, जब कभी भूल करता है, तब कृपासिंधु भगवान उसे सुधार देते हैं।
अचानक जोगा के हृदय से एक वाणी निकली और किसी ने पूछा, ‘जोगा! तू वस्त्र को देखने में लगा है, आज तू मुझे नहीं देखता।’ जोगा ने दृष्टि उठाई तो उन्होंने अनुभव किया कि सामने पंढरीनाथ मुस्कुराते, उलाहना देते हुए खड़े हैं।
पीताम्बर के कारण नित्य-नियम में विघ्न पड़ते देख जोगा को बहुत दुःख हुआ और वह महाद्वार पर बैठकर पश्चाताप में आंसू बहाने लगा।
तभी जोगा ने एक किसान को सुंदर बैलों की जोड़ी पर धुरा (जुआ) रखे जाते देखा। उन्हें अपने अपराध के प्रायश्चित का उपाय सूझा।
उन्होंने किसान से कहा, ‘भैया! यह बहुमूल्य पीताम्बर ले लो और कुछ समय के लिए ये बैल मुझे दे दो। मुझे हल से बांध दो और बैलों को चाबुक मारो ताकि ये मुझे घसीटते हुए दूर तक ले जाएँ। फिर तुम आकर बैलों को ले जाना।’
कहते हैं- ‘लोभ ही समस्त पापों की जड़ है।’ बहुमूल्य पीताम्बर देखकर किसान लोभ में आ गया। उसने जोगा को जुए के साथ बांधकर बैलों पर चाबुक मारा। बैल प्राण बचाने के लिए दूर जंगल की तरफ भागे।
पत्थरों, कंकड़ों और कांटों पर घिसटने से जोगा का शरीर लहूलुहान हो गया। जैसे-जैसे शरीर छिलता और घिसटता, उनकी प्रसन्नता बढ़ती और भगवान के नामों का स्वर ऊंचा होता जाता।
अब जोगा के प्राण निकलने वाले थे, फिर भी उनके मुख से नित्य-नियम के गीता के श्लोक और ‘राम-कृष्ण-हरि’ की ध्वनि जारी थी। भक्त की निष्ठा पूरी हो गई।
भगवान ने अपने प्यारे भक्त का कष्ट देखा और पीताम्बर पहने वनमाली पंढरीनाथ बैलों के बीच प्रकट हुए। उन्होंने जोगा को हल के बंधन से मुक्त किया और बोले-‘तुमने अपने शरीर को इतना कष्ट क्यों दिया? तुम्हारा शरीर तो मेरा हो चुका है। जो तुम खाते हो, वह मेरे ही मुख में जाता है। तुम चलते हो तो मेरी प्रदक्षिणा होती है। जो बातें तुम करते हो, वह मेरी स्तुति है। जब तुम सुख से लेटते हो, तब वह मेरे चरणों में तुम्हारा साष्टांग प्रणाम बन जाता है। तुमने यह कष्ट उठाकर मुझे रुलाया।’
भगवान ने जोगा को अपने हृदय से लगा लिया। भगवान का स्पर्श होते ही जोगा की समस्त पीड़ा और घाव मिट गए। नित्य-नियम का कठोर पालन करने वाले जोगा को भगवान श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण ने सदा के लिए अपने में समाहित कर लिया।
