■ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर अनेकों पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और आगे भी होती रहेंगी, क्योंकि नेताजी अप्रतिम राष्ट्रनायक, महान देशभक्त, कुशल राजनेता और भारत की स्वतंत्रता के लिए तन-मन-धन से क्रांति करने वाले इतिहास के उँगलियों पर गिने जाने वाले साहसी महापुरुषों में से एक हैं। उनके कार्यों की तुलना भारत के इतिहास में किसी अन्य से नहीं की जा सकती।
वे इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) के अधिकारी बने, फिर वहाँ से इस्तीफ़ा देकर अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा को समर्पित कर दिया। कोलकाता के महापौर बने, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की और इसके बाद सशस्त्र क्रांति के मार्ग पर अग्रसर हुए। उनका प्रसिद्ध नारा था, “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”
उनकी आज़ाद हिंद फ़ौज ने आज़ाद हिंद सरकार का गठन किया। इसके बाद युद्ध आरंभ हुआ, जिसमें अनेक सफलताएँ मिलीं। फिर 18 अगस्त 1945 की वह तिथि आई, जिसके बारे में आज भी अनेक रहस्य बने हुए हैं। इस तारीख़ ने पूरी दुनिया को भ्रमित किया। कहा गया कि उसी दिन एक विमान दुर्घटना में नेताजी का महाप्रयाण हो गया, लेकिन यह कथन संदिग्ध रहा। कुछ दशकों बाद नेताजी पहले ‘भगवन जी’ और फिर अयोध्या के परम पूज्य ‘गुमनामी बाबा’ के रूप में प्रकट हुए। 16 सितंबर 1985 को भगवन जी अयोध्या में गोलोकवासी हुए। इस विषय पर अनेक विद्वानों ने शोध किया और यह तथ्य उभरकर सामने आया कि परम पूज्य गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे।
जिस राष्ट्रनायक को अंतर्धान हुए लगभग 80 वर्ष और महाप्रयाण को 40 वर्ष बीत चुके हों, और लोग उन्हें आज भी उतनी ही शिद्दत से याद करते हों, ऐसे थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस। लखनऊ के कवि व साहित्यकार अशोक पांडेय ‘अनहद’ ने एक दिन यह संकल्प लिया कि वे नेताजी के गुमनामी जीवन पर एक शोधपरक पुस्तक लिखेंगे। उनका यह महत्त्वपूर्ण कार्य “एक गुमनाम योद्धा” के रूप में सामने आया, जिसे प्रांजल पब्लिकेशन, कल्याणपुर (लखनऊ) ने प्रकाशित किया है।
272 पृष्ठों की इस कृति के पेपरबैक संस्करण की कीमत ₹400 है। पुस्तक के प्रथम खंड में नेताजी का जन्म और शिक्षा-दीक्षा, ब्रिटेन से वापसी और राजनीति में प्रवेश, कोलकाता का महापौर बनना, जेल यात्राएँ, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षता, फ़ॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना, सशस्त्र क्रांति हेतु प्रस्थान, काबुल होते हुए जर्मनी जाना, जर्मनी से जापान और सिंगापुर प्रस्थान, आज़ाद हिंद सरकार का गठन, युद्ध की शुरुआत, अज्ञात की ओर प्रस्थान, 18 अगस्त की रहस्यमय घटना, विमान दुर्घटना को झुठलाते तथ्य तथा नेताजी की दूरदर्शी रणनीति का विस्तार से वर्णन है।
द्वितीय खंड में लेखक की विभिन्न शोध यात्राओं का विवरण है दिल्ली, बस्ती, इटावा, मैनपुरी, लखनऊ, नैमिषारण्य, अयोध्या, गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड, हाता (लखनऊ), गुप्तार घाट सहित अनेक स्थानों का वर्णन मिलता है। साथ ही आज़ाद हिंद फ़ौज के पूर्व सैनिकों, वरिष्ठ पत्रकारों, चिकित्सकों, पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों तथा प्रत्यक्षदर्शियों के विचार भी संकलित किए गए हैं।
तृतीय खंड में भ्रांतियों का समाधान, गुमनामी बाबा/भगवन जी/नेताजी का कालक्रम, लिखित प्रमाण, पत्राचार, लिखावट का विश्लेषण, गवाहों के बयान, रोचक तथ्य, लेखक द्वारा उठाए गए ज्वलंत प्रश्न और जनमानस की जिज्ञासाओं जैसे विमान दुर्घटना की सच्चाई, नेताजी का लंबा अज्ञातवास और आज़ादी में उनकी भूमिका पर गंभीर विमर्श किया गया है।
इस विस्तृत अनुक्रमणिका से स्पष्ट होता है कि लेखक अशोक पांडेय ‘अनहद’ ने इस ग्रंथ के सृजन में कितना गहन परिश्रम किया है। पुस्तक में लेखक लिखते हैं कि जून 2024 में भगवन जी की प्रेरणा से उन्होंने अयोध्या स्थित राम भवन से इस शोध यात्रा का शुभारंभ किया और पूरे एक वर्ष तक दिन-रात परिश्रम करके इस ग्रंथ को पूर्ण किया। उनका उद्देश्य नेताजी के सम्पूर्ण जीवन 23 जनवरी 1897 से 16 सितंबर 1985—का प्रमाणिक वृतांत जन-जन तक पहुँचाना है ताकि विशेष रूप से युवा पीढ़ी नेताजी के अतुलनीय योगदान से परिचित हो सके।
अशोक पांडेय ‘अनहद’ मूल रूप से ग्राम व पोस्ट अहदा (बड़ा), मोतिगरपुर, जयसिंहपुर, जनपद सुल्तानपुर के निवासी हैं। अब तक उनकी कुल 10 कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें काव्य संग्रह, छंदबद्ध और छंदमुक्त काव्य, गीत, घनाक्षरी, मुक्तक, दोहा संग्रह तथा यात्रा वृत्तांत शामिल हैं। वे पीएसी में लगभग 16 वर्ष और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) उत्तर प्रदेश, लखनऊ के कार्यालय में 13 वर्षों तक कार्यरत रहे। इसके पश्चात उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्वयं को साहित्यिक और आध्यात्मिक साधना में समर्पित कर दिया।
कुल मिलाकर अशोक पांडेय ‘अनहद’ की कृति “एक गुमनाम योद्धा” एक शोधपरक महाग्रंथ है, जिसके प्रत्येक पृष्ठ पर लेखक की साधना, शोध और परिश्रम स्पष्ट झलकता है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के व्यक्तित्व और कृतित्व को तथ्यात्मक रूप से समझने के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। इस ग्रंथ के माध्यम से लेखक ने संपूर्ण मानवता के लिए एक महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। विशेष रूप से देश की युवा पीढ़ी को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए, ताकि उन्हें राष्ट्रनायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन और संघर्ष की प्रमाणिक जानकारी प्राप्त हो सके।
