■ संतोष सिंह

पारंपरिक रवायती शायरी के बड़े नाम कृष्णबिहारी नूर साहब के शिष्य गोविंद गुलशन ग़ज़लों में नए प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं। जीवन, प्रकृति, प्रेम, विरह, संवेदना, विद्रोह, अहसासों का मंथन और भावनाओं की तीव्रता उनकी ग़ज़लों की प्रमुख विषयवस्तु है। वहीं गहन विचारों की प्रबलता को अध्यात्म से जोड़कर नए-नए रंग भरना कोई गोविंद गुलशन जी से सीखे।
जीवन के विविध रंगों को छोटी-छोटी शीशियों में भरकर हमारे सामने रख देना और उन पर विचार करने को प्रेरित करना—ऐसे शब्दों को शायरी में ढालकर वे शेर और ग़ज़लों के माध्यम से मानो सबको अपनी ओर खींच लेते हैं।
नए प्रयोगों से परहेज़ किए बिना पारंपरिक ग़ज़लों को जीवित रखने का कार्य, अधूरेपन से लेकर प्रेम और फिर वियोग के स्वर-गोविंद गुलशन जी के यहाँ स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। अध्यात्म से जुड़े अनेक पहलू और आध्यात्मिक चिंतन की ओर ध्यान आकर्षित करती पंक्तियाँ पाठक को भीतर तक छू जाती हैं। उनके शेर हमें कुछ खोने-पाने की लालसा से दूर ले जाते हैं।
रोज़मर्रा की ज़िंदगी की उधेड़-बुन, आशा-निराशा, हार-जीत तथा धूप-छाँव को अपनी ग़ज़लों में समेटे गोविंद गुलशन जी की रचनाएँ विविधता से भरपूर हैं। जहाँ एक ओर गहन सोच के अनेक रंग बिखेरती ग़ज़लें मानो रेगिस्तान की कँटीली झाड़ियों में खिलते छोटे-छोटे जंगली फूलों की तरह जीवन का संकेत देती हैं, वहीं दूसरी ओर जीवन की आपाधापी में उलझनों को सुलझाती हुई ये ग़ज़लें परिवर्तन और सार्थकता का संदेश देती हैं।
एक आशावादी व्यक्तित्व के धनी ऐसे रचनाकार, जो प्रेम से संवाद करते हैं और ज़िंदगी की तमाम परेशानियों से जूझते हुए भी चेहरे पर मुस्कान रखते हैं-बिना किसी शिकायत के रोज़मर्रा के जीवन में आशावाद का संदेश देते हुए यह संवेदनशील व्यक्तित्व अपनी अप्रतिम ग़ज़लों के साथ हमारे बीच जीवित है।
दिल है उसी के पास,
हैं साँसें उसी के पास,
देखा उसे तो रह गईं आँखें उसी के पास।
बुझने से जिस चराग़ ने इन्कार कर दिया,
चक्कर लगा रही हैं हवाएँ उसी के पास।
बुझा रही है चराग़ों को वक़्त से पहले,
न जाने किस के इशारों पे चल रही है हवा।
इस क़दर भीड़ कि दुश्वार है चलना सबका,
और इक वो है कि रफ़्तार बना रक्खी है।
वक़्त-ए-रुख़्सत न दिया साथ ज़बाँ ने लेकिन,
अश्क़ बनकर मिरी आँखों में तराने आए।
जब आँसुओं में बह गए यादों के सारे नक़्श,
आँखों में कैसे रह गया मंज़र बना हुआ।
तोड़ लाए शीशा-ए-दिल फिर कहीं,
तुम अँधेरे में कहाँ टकरा गए।
न बोलने की मनाही, न कोई दुश्वारी,
ज़बाँ सभी को मयस्सर है और सब चुप हैं।
जान लेता है कभी, जान बचा लेता है,
फ़ितरतें रखता है दरियाओं का पानी क्या-क्या।
इस पार मैं हूँ और ये टूटी हुई-सी नाव,
आवाज़ दे रहा है जो उस पार कौन है।
कोई तस्वीर अगर दिल में उतर जाती है,
नींद आती ही नहीं, रात ठहर जाती है।
एक ही पल है बहुत ख़ुद को समझने के लिए,
और उस पल के लिए उम्र गुज़र जाती है।
अभी न तोड़िए उम्मीद के नशेमन को,
ख़िज़ाँ के बाद का मौसम बहार वाला है।
डूबने से मैं बचा लेता हूँ सूरज का वुजूद,
ख़ुदग़र्ज़ हूँ कि मुझे रात से डर लगता है।
जीने-मरने का कोई ख़ौफ़ नहीं था पहले,
अब ये आलम है हर इक बात से डर लगता है।
मुसलसल ज़लज़ले आने लगे हैं,
निगल जाएगी सब कुछ ही ज़मीं क्या।
