■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार भगवान शिव जी पार्वती जी के साथ हरिद्वार में घूम रहे थे। पार्वती जी ने देखा कि सहस्त्रों मनुष्य गंगा में नहा कर ‘हर हर गंगे’ कहते चले जा रहे हैं परंतु सभी दुखी और पापग्रस्त हैं।
तब पार्वती जी ने बड़े आश्चर्य से शिव जी से पूछा,“हे देव! गंगा में इतनी बार स्नान करने पर भी इनके पाप और दुख क्यों नहीं नष्ट हुए? क्या गंगा में पाप नाश करने की शक्ति समाप्त हो गई?”
शिव जी ने कहा, “प्रिय, गंगा में वही सामर्थ्य है। परंतु इन लोगों ने पापनाशिनी गंगा में स्नान ही नहीं किया है। तब इन्हें लाभ कैसे होगा?”
पार्वती जी ने आश्चर्य से पूछा, “स्नान कैसे नहीं किया? सभी तो नहा कर आ रहे हैं। अभी तक तो इनके शरीर भी गीले हैं।”
शिव जी ने उत्तर दिया,“ये केवल जल में डुबकी लगाकर आ रहे हैं। इसका रहस्य मैं कल समझाऊँगा।”
अगले दिन, जोर की बरसात होने लगी। गलियाँ कीचड़ से भर गईं। एक चौड़े रास्ते में गहरा गड्ढा था, चारों ओर कीचड़ भरा हुआ था।
शिव जी ने लीला दिखाते हुए वृद्ध रूप धारण किया और दीन-दुखी की तरह गड्ढे में गिर पड़े। जैसे कोई मनुष्य गिरने के बाद निकलने की कोशिश करता है, पर न निकल पाए।
पार्वती जी को शिव जी ने समझाकर गड्ढे के पास बैठा दिया और कहा, “देखो, तुम लोगों को सुनो-सुनो करते हुए पुकारती रहो कि मेरे वृद्ध पति अकस्मात गड्ढे में गिर पड़े हैं। कोई पुण्यात्मा इन्हें निकालकर इनके प्राण बचाए और मेरी सहायता करे।”
शिव जी ने आगे कहा, “जब कोई गड्ढे से मुझे निकालने को तैयार हो, तब बस इतना कह देना कि मेरे पति सर्वथा निष्पाप हैं। उन्हें वही छू सके जो स्वयं निष्पाप हो। यदि आप निष्पाप नहीं हैं, तो हाथ लगाते ही आप भस्म हो जाओगे।”
पार्वती जी तथास्तु कहकर गड्ढे के किनारे बैठ गईं और आने-जाने वालों को शिव जी की यह बात कहने लगीं।
गंगा में नहा कर लोग आ रहे थे। कुछ सुंदर युवती को पार्वती जी को गड्ढे के पास बैठा देख कर कई लोगों के मन में पाप उत्पन्न हुआ। कुछ ने लज्जा, धर्म या कानून का भय अनुभव किया। कुछ ने तो पार्वती जी से कहा, “मरने दे बुड्ढे को, क्यों उसके लिए रोती है।”
आगे कुछ दयालु और सच्चरित्र पुरुष भी आए। उन्होंने करुणा वश बूढ़े को निकालने की इच्छा व्यक्त की, पर पार्वती जी के वचन सुनकर वे भी रुक गए।
उन्होंने सोचा,“हम गंगा में नहा कर आए हैं तो क्या हुआ? पापी हैं तो कहीं हाथ न जल जाए। बूढ़े को निकालने की वजह से हम स्वयं भस्म न हो जाएँ।”
सैंकड़ों लोग आए, पूछा और चले गए। संध्या हो चली।
शिव जी ने पार्वती से कहा,“देखा, आया कोई सच्चे हृदय से गंगा में नहाने वाला?”
कुछ देर बाद एक जवान लोटा लेकर, ‘हर हर गंगे’ करते हुए निकला। पार्वती जी ने उसे वही बात कही।
युवक का हृदय करुणा से भर गया। उसने शिव जी को निकालने की तैयारी की।
पार्वती जी ने चेतावनी दी,“यदि तुम सर्वथा निष्पाप नहीं हो तो मेरे पति को छूते ही जल जाओगे।”
युवक ने दृढ़ निश्चय के साथ कहा,“माता, मेरे निष्पाप होने में संदेह क्यों? मैंने अभी गंगा नहाया है। गंगा में गोता लगाने के बाद पाप नहीं रहते। मैं अभी आपके पति को निकालता हूँ।”
इतने में युवक ने बूढ़े को ऊपर उठा लिया। शिव–पार्वती ने उसे धर्माधिकारी समझकर अपना असली स्वरूप प्रकट किया और दर्शन देकर उसे कृतार्थ किया।
शिव जी ने पार्वती से कहा,“इतने लोगों में से केवल इस एक ने ही सच्चे हृदय से गंगा स्नान किया है।”
