■ हिमांशु राज़

अरावली पर्वतमाला सिर्फ एक भू-आकृति नहीं है, यह उत्तर भारत की जीवनरेखा है। यह वही प्राचीन श्रृंखला है, जिसने राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात के मौसम, मिट्टी और जल-चक्र को संतुलित रखा। करोड़ों साल पुरानी यह धरती आज स्वयं अपने अस्तित्व से जूझ रही है। जहाँ कभी पक्षियों की चहचहाहट और पेड़ों की हरियाली फैली रहती थी, वहाँ अब मशीनों का शोर और उड़ती धूल दिखाई देती है।
बीते कुछ दशकों में अवैध खनन, अतिक्रमण और निर्माण गतिविधियों ने अरावली के शरीर को बुरी तरह जख्मी कर दिया है। पहाड़ों से ग्रेनाइट और बालू निकालने के लिए लगातार खुदाई की जा रही है। जिन चट्टानों पर कभी बादल टिकते थे, वहाँ अब गड्ढों का साम्राज्य फैल गया है। यही वह अरावली है, जिसे कभी उत्तर भारत को रेगिस्तान बनने से रोकने वाली ढाल कहा जाता था।
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली के क्षरण से थार मरुस्थल की रेत अब हरियाणा और दिल्ली की ओर बढ़ रही है। पहले जो हवा ठंडी और नम हुआ करती थी, वह अब धूल और प्रदूषण से बोझिल हो गई है। यह केवल एक पारिस्थितिक संकट नहीं है, मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। बढ़ते तापमान और गिरते भूजल स्तर ने खेती और स्वास्थ्य, दोनों को प्रभावित किया है। गाँवों में पुराने कुएँ सूख चुके हैं, खेतों में दरारें पड़ चुकी हैं और शहरों की हवा में साँस लेना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है।

अरावली केवल पत्थरों की श्रृंखला नहीं है, यह पानी के संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन की एक प्राकृतिक प्रणाली है। जब तक यह स्थिर थी, बारिश का पानी धरती के भीतर रिसता रहा और जल-भंडार भरता रहा। खनन ने अब इस क्षमता को नष्ट कर दिया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो अगले दो दशकों में उत्तर भारत की आधी भूमि अर्ध-रेगिस्तान में बदल सकती है।
सरकारों और अदालतों ने समय-समय पर खनन पर रोक के आदेश दिए, लेकिन आर्थिक स्वार्थ ने इन आदेशों को कमजोर कर दिया। कागजों पर रोक है, जबकि ज़मीन पर अवैध ट्रक और मशीनें बदस्तूर चल रही हैं। इस विडंबना के पीछे केवल भ्रष्टाचार ही नहीं, समाज की उदासीनता भी एक बड़ा कारण है। कोई भी नीति तब तक प्रभावी नहीं होती, जब तक जनता उसमें सक्रिय भागीदार न बने।
फिर भी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। राजस्थान और हरियाणा के कई गाँवों में स्थानीय लोगों ने मिलकर अरावली को बचाने का अभियान शुरू किया है। वे वृक्षारोपण, वर्षा-जल संचयन और जैव-विविधता संरक्षण में जुटे हुए हैं। कई युवाओं ने सोशल मीडिया के ज़रिये लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया है। स्कूलों और कॉलेजों में भी ‘सेव अरावली’ अभियान धीरे-धीरे गति पकड़ रहा है। ये छोटे-छोटे प्रयास इस उम्मीद को जीवित रखते हैं कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।

पर्यावरणविदों का मानना है कि अरावली का पुनरुद्धार केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी, खनन पर सख़्त निगरानी और पुनर्वनीकरण की दीर्घकालिक रणनीति अनिवार्य है। यदि हम पहाड़ों के कटे हुए हिस्सों को पुनर्जीवित नहीं कर सकते, तो कम से कम बचे हुए हिस्सों की रक्षा करना तो हमारा कर्तव्य है।
विकास और विनाश के बीच की रेखा बहुत पतली होती है। जब विकास के नाम पर प्रकृति की सीमाएँ तोड़ी जाती हैं, तो उसका परिणाम अंततः मानव समाज को भुगतना पड़ता है। आज जो संसाधन हमें सुविधा दे रहे हैं, वही कल अस्तित्व के संकट में बदल सकते हैं। यह समझना आवश्यक है कि पर्यावरण की रक्षा केवल कोई आंदोलन या क़ानून नहीं, जीवन की बुनियादी शर्त है।
अरावली की पुकार हमें चेतावनी दे रही है, यदि आज नहीं चेते, तो कल यह आवाज़ हमेशा के लिए खो जाएगी। ये पहाड़ हमारे इतिहास, हमारी सभ्यता और हमारी साँसों के प्रहरी हैं। जब ये टूटते हैं, तो केवल चट्टानें नहीं बिखरतीं, प्रकृति का संतुलन भी टूट जाता है। अरावली को बचाना किसी विचारधारा का प्रश्न नहीं, आने वाली पीढ़ियों के जीवन की लड़ाई है। और यह लड़ाई अब शुरू करनी ही होगी, यहीं, अभी।
