■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार मैं ट्रेन से यात्रा कर रहा था। मेरी बगल वाली सीट पर एक वृद्ध महिला बैठी थीं, जो लगातार रो रही थीं।
मैंने बार-बार पूछा, “मइया, क्या हुआ? मइया, क्या हुआ?”
बहुत आग्रह करने पर मइया ने एक लिफ़ाफ़ा मेरे हाथ में दिया। मैंने लिफ़ाफ़ा खोलकर देखा। उसमें चार पेड़े, 200 रुपये और इत्र से सनी हुई कपड़े की एक कटोरी थी।
मैंने मइया से पूछा, “मइया, यह क्या है?”
मइया बोलीं, “मैं वृंदावन बिहारी जी के मंदिर गई थी। मैंने गुल्लक में 200 रुपये डाले और दर्शन के लिए आगे बिहारी जी के पास चली गई। वहाँ गोस्वामी जी ने मेरे हाथ में एक पेड़ा रख दिया।
मैंने गोस्वामी जी से कहा, ‘मुझे दो पेड़े दे दीजिए, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। मैंने ग़ुस्से में कहा, मैंने 200 रुपये डाले हैं, मुझे पेड़े भी चाहिए पर गोस्वामी जी नहीं माने। ग़ुस्से में मैंने वह एक पेड़ा भी उन्हें वापस दे दिया और बिहारी जी को कोसते हुए बाहर आकर बैठ गई।”
मइया बोलीं, “मैं जैसे ही बाहर आई, तभी एक बालक मेरे पास आया और बोला, ‘मइया, मेरा प्रसाद पकड़ लीजिए, मुझे जूते पहनने हैं।’
उसने मुझे प्रसाद पकड़ाया, खुद जूते पहनने लगा और फिर हाथ धोने चला गया। लेकिन वह वापस नहीं आया। मैं पागलों की तरह उसका इंतज़ार करती रही।
काफ़ी देर बाद मैंने उस लिफ़ाफ़े को खोलकर देखा। उसमें 200 रुपये, चार पेड़े और एक काग़ज़ था, जिस पर लिखा था- ‘मइया, अपने लाला से नाराज न हुआ करो। यही वह लिफ़ाफ़ा है।’ वृद्ध महिला की आंखें फिर डबडबा गई थीं।
।। हरे कृष्ण ।।
