■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक व्यक्ति कुछ पैसे निकलवाने के लिए बैंक गया। जैसे ही कैशियर ने भुगतान किया, कस्टमर ने चुपचाप पैसे अपने बैग में रखे और चल दिया। उसने एक लाख चालीस हज़ार रुपए निकलवाए थे। उसे पता था कि कैशियर ने गलती से एक लाख चालीस हज़ार की जगह एक लाख साठ हज़ार रुपए दे दिए हैं, लेकिन उसने यह आभास कराते हुए कि उसने पैसे गिने ही नहीं और कैशियर की ईमानदारी पर उसे पूरा भरोसा है, चुपचाप पैसे रख लिए।
इसमें उसका कोई दोष था या नहीं, लेकिन पैसे बैग में रखते ही अतिरिक्त 20,000 रुपयों को लेकर उसके मन में उधेड़-बुन शुरू हो गई। एक पल उसके मन में आया कि फालतू पैसे वापस लौटा दे, लेकिन दूसरे ही पल उसने सोचा, जब मैं ग़लती से किसी को ज़्यादा भुगतान कर देता हूँ तो मुझे कौन लौटाने आता है?
बार-बार मन में विचार आया कि पैसे लौटा दे, लेकिन हर बार दिमाग कोई-न-कोई बहाना या वजह देकर पैसे न लौटाने का तर्क दे देता।
लेकिन इंसान के भीतर केवल दिमाग ही तो नहीं होता… दिल और अंतरात्मा भी तो होती है… रह-रहकर उसके अंदर से आवाज़ आ रही थी, तुम किसी की ग़लती से फ़ायदा उठाने से नहीं चूकते और ऊपर से बेईमान न होने का ढोंग भी करते हो। क्या यही ईमानदारी है?
उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। अचानक उसने बैग से बीस हज़ार रुपए निकाले, जेब में डाले और बैंक की ओर चल दिया।
जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था, उसकी बेचैनी और तनाव कम होने लगा। वह स्वयं को हल्का और स्वस्थ अनुभव कर रहा था। वह कोई बीमार तो था नहीं, लेकिन उसे लग रहा था मानो किसी बीमारी से मुक्ति मिल गई हो। उसके चेहरे पर किसी युद्ध को जीत लेने जैसी प्रसन्नता व्याप्त थी।
रुपए पाकर कैशियर ने चैन की साँस ली। उसने कस्टमर को अपनी जेब से हज़ार रुपए का एक नोट निकालकर देते हुए कहा, “भाई साहब, आपका बहुत-बहुत आभार! आज मेरी तरफ़ से बच्चों के लिए मिठाई ले जाना। प्लीज, मना मत करना।”
“भाई, आभारी तो मैं हूँ आपका और आज मिठाई भी मैं ही आप सबको खिलाऊँगा,” कस्टमर बोला।
कैशियर ने पूछा, “भाई, आप किस बात का आभार प्रकट कर रहे हैं और किस ख़ुशी में मिठाई खिला रहे हैं?”
कस्टमर ने जवाब दिया,“आभार इस बात का कि बीस हज़ार के चक्कर ने मुझे आत्म-मूल्यांकन का अवसर प्रदान किया। आपसे यह गलती न होती तो न मैं इस द्वंद्व में फँसता और न ही उससे निकलकर अपनी लोभवृत्ति पर क़ाबू पा पाता। यह बहुत कठिन काम था। घंटों के द्वंद्व के बाद ही मैं जीत पाया। इस दुर्लभ अवसर के लिए आपका आभार।”
● मित्रों, एक ओर वे लोग हैं जो अपनी ईमानदारी का पुरस्कार और प्रशंसा पाने का अवसर नहीं चूकते और दूसरी ओर वे हैं जो दूसरों को पुरस्कृत करते हैं। ईमानदारी का कोई अलग पुरस्कार नहीं होता; ईमानदारी स्वयं में ही एक बहुत बड़ा पुरस्कार है।
