■ मुंबई-गोरेगांव में 11 जनवरी तक रामकथा

● मुंबई
गोरेगांव पश्चिम स्थित बांगुर नगर के लक्ष्मी सरस्वती ग्राउंड में 11 जनवरी तक आयोजित नौ दिवसीय रामकथा के दौरान व्यासपीठ से राजन महाराज ने कहा कि सत्संग और विवेक के अभाव में उच्च शिक्षित लोग भी आतंकवाद जैसी विकृत प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर हो जाते हैं।
राजन महाराज ने कहा कि जो पुण्य वेद मंत्रों के पठन से प्राप्त होता है, वही पुण्य भगवान की जय-जयकार करने से भी मिलता है। उन्होंने बताया कि गोस्वामी तुलसीदास जी दुष्टों की भी वंदना इसलिए करते थे, क्योंकि वे प्रत्येक प्राणी के भीतर श्रीसीताराम के दर्शन करते थे। मानस को कहने और सुनने दोनों का पुण्य समान है।
प्रेममूर्ति पूज्य श्री प्रेमभूषण महाराज के कृपापात्र पूज्य राजन महाराज ने श्रोताओं के विशाल समूह को संबोधित करते हुए कहा कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस को गंगा के समान पवित्र इसलिए माना, क्योंकि इसकी प्रत्येक चौपाई में प्रभु श्रीराम का नाम समाहित है। उन्होंने कहा कि जीवन का वास्तविक परिचय संपत्ति से नहीं, भक्ति से होना चाहिए।
तीर्थराज प्रयाग का उल्लेख करते हुए पूज्य राजन महाराज ने कहा कि मकर संक्रांति के दिन प्रयाग में केवल मनुष्य ही नहीं, सभी देवी-देवताओं का भी आगमन होता है। इस दिन सभी सनातन धर्मावलंबी शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए काला तिल अर्पित करते हैं।
भगत की सुंदर परिभाषा देते हुए उन्होंने कहा, “भगत वही है, जिसकी हर बात से भगवान की कथा निकल आए।” उन्होंने यह भी कहा कि जीवन में कुछ प्राप्त करने के लिए पहले स्वयं को रिक्त रखना आवश्यक है। विद्वान के समक्ष मूर्ख बनकर ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। सत्संग के बिना विवेक की प्राप्ति संभव नहीं है और इसी सत्संग व विवेक की शून्यता ने शिक्षित लोगों को भी आतंकवादी बना दिया।
शिव–सती प्रसंग के माध्यम से रामकथा का रसपूर्ण गायन करते हुए पूज्य राजन महाराज ने कहा कि कथा श्रवण से मन में भगवान के दर्शन की प्रबल इच्छा जागृत होना ही कथा श्रवण की वास्तविक फलश्रुति है। उन्होंने बताया कि भगवान शिव को भगवान पर पूर्ण विश्वास था, जबकि सती जी के मन में संशय था, इसलिए भोलेनाथ उनके साथ नहीं गए, क्योंकि विश्वास और संशय एक साथ नहीं रह सकते।

दक्ष प्रजापति के यज्ञ विध्वंस प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि अधिकार की प्राप्ति से अभिमान जन्म लेता है। इस अभिमान से बचने के लिए अपनी सभी उपलब्धियों को भगवान की कृपा मानकर व्यवहार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पिता, गुरु, मित्र और स्वामी के घर बिना बुलाए भी जाया जा सकता है, किंतु यदि वहां अपमान का भाव दिखाई दे, तो वहां कभी नहीं जाना चाहिए। भगवान के बाद मां ही ऐसी सत्ता है, जो अपने बच्चों का त्याग कभी नहीं करती।
पूज्य राजन महाराज ने यह भी कहा कि किसी को नीचा दिखाने की भावना से किया गया सद्कर्म भी व्यर्थ हो जाता है। अतः कोई भी सद्कर्म किसी के अपमान के लिए नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि वह अनिष्टकारी होता है।
यज्ञ विध्वंस और सती के प्राणोत्सर्ग की कथा के पश्चात उन्होंने भगवान शंकर और माता पार्वती के मंगल विवाह की अद्भुत कथा सुनाकर श्रोताओं की विशाल भीड़ को विवाह महोत्सव के भाव में सराबोर कर दिया। कथा के दौरान हर आयु वर्ग के श्रोता थिरकते, झूमते और गुनगुनाते नज़र आए।
प्रसंगानुसार पूज्य राजन महाराज ने “शंकर तेरी जटा से बहती है गंग धारा”, “शिव दुल्हा सरकार का सिंगार होखत ता”, “संतन के संग तेरी अच्छी बनेगी”, “मेरा राम की कृपा से सब काम हो रहा है” सहित अनेक लोकप्रिय भजनों से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
कथा में उपस्थित श्रद्धालुओं में गणेश अग्रवाल, ममता अग्रवाल, अशोका तिवारी, प्रीति पांडे, सरिता चौबे, विनय चौबे, रेखा गुप्ता, समाजसेविका सुधा दूबे सहित अनेक भक्तों ने कथा श्रवण का लाभ प्राप्त किया।
उल्लेखनीय है कि यह रामकथा महोत्सव चंद्रकांत गुप्ता और चमेली देवी गुप्ता के पावन संकल्प से रामकथा सेवा समिति, मुंबई द्वारा आयोजित किया गया है।
