■ हिमांशु राज़

अमेरिका द्वारा वेनेज़ुएला पर किया गया हमला किसी लोकतंत्र की पुनर्स्थापना या आतंकवाद के विरुद्ध अभियान नहीं बल्कि डॉलर नामक मुद्रा के अस्तित्व की भीषण जंग थी। इस संघर्ष की जड़ें सन् 1974 में हेनरी किसिंजर और सऊदी अरब के बीच हुए उस गुप्त समझौते तक जाती हैं, जिसने “पेट्रोडॉलर व्यवस्था” को जन्म दिया और लगभग आधी शताब्दी तक अमेरिकी मुद्रा को विश्व की प्रधान शक्ति बनाए रखा।
वेनेज़ुएला के पास आज पृथ्वी का सबसे विशाल तेल भंडार है, लगभग तीन सौ तीन अरब बैरल, जो सऊदी अरब से भी अधिक है। यह संसार के कुल तेल भंडार का लगभग पाँचवाँ भाग है। किंतु संकट की शुरुआत तब हुई जब वेनेज़ुएला ने घोषणा की कि वह अब तेल का लेनदेन अमेरिकी डॉलर में नहीं बल्कि चीनी ‘युआन’, ‘रूसी रूबल’ और ‘यूरोपीय मुद्रा’ में करेगा। वर्ष 2018 में वहाँ की सरकार ने खुले शब्दों में कहा, “हम अब डॉलर की बेड़ियों से मुक्त होंगे।” उसके बाद वेनेज़ुएला ब्रिक्स नामक आर्थिक समूह में सम्मिलित होने और चीन के साथ ऐसे भुगतान मार्ग स्थापित करने लगा, जो अमेरिकी वित्तीय तंत्र ‘स्विफ्ट’ से पूरी तरह अलग थे।यही वह मोड़ था जिसने अमेरिकी वर्चस्व को सीधे चुनौती दी। सन् 1974 में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच यह करार हुआ था कि विश्व का प्रत्येक देश यदि तेल खरीदेगा तो उसे भुगतान अमेरिकी डॉलर में करना होगा, और बदले में अमेरिका सऊदी राजशाही की सुरक्षा करेगा। इस व्यवस्था ने कृत्रिम रूप से डॉलर की माँग बढ़ाई और अमेरिका को यह अधिकार दिया कि वह जितनी चाहे मुद्रा छाप सके, क्योंकि विश्व उस पर निर्भर हो चुका था।
यही भ्रमित व्यवस्था अमेरिकी सैन्य विस्तार, सामाजिक योजनाओं और घाटे में डूबी अर्थव्यवस्था का आधार बन गई।इतिहास गवाह है कि जिसने भी इस आर्थिक प्रभुत्व को ललकारा, उसका अंत भयावह हुआ। सन् 2000 में इराक के शासक सद्दाम हुसैन ने कहा कि अब उनका देश तेल का व्यापार यूरोपीय मुद्रा में करेगा। तीन वर्ष बाद, 2003 में इराक पर अमेरिकी आक्रमण हुआ, शासन पलट गया और तेल फिर डॉलर में बिकने लगा। सन् 2009 में लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी ने सम्पूर्ण अफ्रीका के लिए सोने पर आधारित “दीनार” नामक साझा मुद्रा का विचार रखा, जिससे तेल का लेनदेन डॉलर से मुक्त हो जाता। दो वर्ष बाद, 2011 में नाटो के बमवर्षकों ने लीबिया को धूल में मिला दिया और गद्दाफी की हत्या के साथ वह स्वप्न भी समाप्त हो गया। आज वही कहानी वेनेज़ुएला में दोहराई गई है।

निकोलस मादुरो के पास तेल का ऐसा भंडार है जो सद्दाम और गद्दाफी दोनों के सम्मिलित भंडार से पाँच गुना अधिक है। वे डॉलर से मुक्त व्यावस्था अपनाने के साथ चीन, रूस और ईरान के साथ मिलकर एक नई मुद्रा-व्यवस्था बना रहे थे, जो अमेरिकी नियंत्रण से बाहर थी। यह कदम वाशिंगटन के लिए सीधा खतरा था, क्योंकि ब्रिक्स राष्ट्र पहले ही एक ऐसी वैश्विक आर्थिक प्रणाली गढ़ रहे हैं जो डॉलर के बिना चल सके। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्टीफन मिलर का यह कथन उनकी मानसिकता उजागर करता है- “वेनेज़ुएला का तेल अमेरिकी परिश्रम का परिणाम है, जिसे वहाँ की तानाशाही ने हमसे छीन लिया।” यह विचार उसी पुराने साम्राज्यवादी सोच से उपजा है जिसमें हर देश के संसाधनों को अमेरिका अपनी निजी संपत्ति समझता है, सिर्फ इसलिए कि कभी वहाँ उसकी कंपनियाँ काम करती थीं।
अब वह आर्थिक ढाँचा दरकने लगा है जिस पर अमेरिकी साम्राज्य खड़ा था। रूस अपने तेल का व्यापार अपनी मुद्रा में कर रहा है, ईरान और चीन भी डॉलर से परे लेनदेन करने लगे हैं। सऊदी अरब तक अब चीनी मुद्रा में भुगतान की संभावना टटोल रहा है। चीन ने “अंतरराष्ट्रीय भुगतान तंत्र” और “बहु-मुद्रा सेतु परियोजना” जैसी प्रणालियाँ विकसित की हैं, जिनसे विश्व व्यापार बिना डॉलर के भी संभव हो रहा है। यदि वेनेज़ुएला ब्रिक्स में शामिल हो जाता, तो यह परिवर्तन कुछ वर्षों में डॉलर को वैश्विक मंच से पीछे ढकेल सकता था।तीन जनवरी 2026 को अमेरिकी सेनाएँ वेनेज़ुएला में उतरीं और राष्ट्रपति मादुरो को बंदी बना लिया गया। यह वही तारीख है जब छत्तीस वर्ष पहले तीन जनवरी 1990 को अमेरिका ने पनामा में सेनाएँ भेजी थीं।
दोनों बार कहानी एक जैसी रही “मादक पदार्थों की तस्करी” का बहाना और परिणामस्वरूप स्थानीय शासन का पतन। अब अमेरिकी पेट्रोलियम कम्पनियाँ लौट रही हैं और वेनेज़ुएला का तेल पुनः डॉलर में बिकने लगेगा। वह एक और इराक, एक और लीबिया बन जाएगा। परंतु बड़ा प्रश्न यही है कि कब तक कोई मुद्रा अपने साम्राज्य को बमों के सहारे बचा सकती है? जब चीन और ब्रिक्स के देश सामूहिक रूप से इंकार कर देंगे, तब क्या अमेरिका बिना युद्ध के भी अपना आर्थिक शासन बनाए रख पाएगा?
यह समय साक्षी है, जब किसी मुद्रा की प्रतिष्ठा के लिए हिंसा आवश्यक हो जाए, तो उसका अवसान आरंभ हो चुका होता है। वेनेज़ुएला का संकट एक आरंभ नहीं, बल्कि उस साम्राज्यवादी दौर का अंतिम अध्याय है जहाँ अब विश्व की शक्ति पश्चिम से सरककर पूरब की ओर जा रही है।
