■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक नगर के राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य द्वार खोला जाएगा, तब जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु को हाथ लगा दिया, वह वस्तु उसकी हो जाएगी।
यह घोषणा सुनकर सभी लोग आपस में बातचीत करने लगे। कोई कहने लगा, मैं अमुक वस्तु को हाथ लगाऊँगा।
कुछ लोग बोले, मैं स्वर्ण को हाथ लगाऊँगा, कुछ ने कहा, मैं कीमती जेवरात को हाथ लगाऊँगा।
घोड़ों के शौक़ीन बोले, मैं तो घोड़ों को हाथ लगाऊँगा। कुछ लोग हाथियों को हाथ लगाने की बात कर रहे थे,
तो कुछ कह रहे थे कि मैं दुधारू गौओं को हाथ लगाऊँगा।
कल्पना कीजिए, वह दृश्य कितना अद्भुत होगा!
उसी समय महल का मुख्य द्वार खुला और सभी लोग अपनी-अपनी मनपसंद वस्तुओं को हाथ लगाने दौड़ पड़े।
सबको जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगा दूँ, ताकि वह वस्तु हमेशा के लिए मेरी हो जाए।
साथ ही सबके मन में यह भय भी था कि कहीं मुझसे पहले कोई दूसरा मेरी पसंदीदा वस्तु को हाथ न लगा दे।
राजा अपने सिंहासन पर बैठा सब कुछ देख रहा था और अपने आसपास हो रही भाग-दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था।
उसी समय उस भीड़ में से एक छोटी-सी लड़की निकली और राजा की ओर बढ़ने लगी।
उसे देखकर राजा सोच में पड़ गया-विचार करने लगा कि यह लड़की बहुत छोटी है, शायद मुझसे कुछ पूछने आ रही है।
वह लड़की धीरे-धीरे चलती हुई राजा के पास पहुँची और अपने नन्हे हाथों से राजा को हाथ लगा दिया।
राजा को हाथ लगाते ही राजा उस लड़की का हो गया और राजा की प्रत्येक वस्तु भी उस लड़की की हो गई।
मित्रों, जिस प्रकार राजा ने लोगों को अवसर दिया और लोगों ने गलती कर दी,
ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमें प्रतिदिन अवसर देते हैं और हम प्रतिदिन गलती करते हैं। हम इस सत्य पर कभी विचार नहीं करते कि यदि ईश्वर हमारे हो जाएँ,
तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु स्वतः हमारी हो जाएगी।
ईश्वर को चाहना
और
ईश्वर से चाहना
-इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।
