■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार लक्ष्मी और नारायण धरा पर भ्रमण के लिए आए। कुछ समय घूमने के बाद वे विश्राम हेतु एक बगीचे में जाकर बैठ गए। नारायण आँखें बंद कर लेट गए और लक्ष्मी जी आसपास के दृश्य देखने लगीं।
थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा कि एक आदमी शराब के नशे में धुत, गाना गाते हुए चला आ रहा था। अचानक उसे ठोकर लगी। वह पत्थर को लात मारने लगा और अपशब्द कहने लगा। लक्ष्मी जी को यह देख बुरा लगा। तभी उसकी ठोकरों से वह पत्थर हट गया और वहाँ से एक पोटली निकल आई। उसने पोटली उठाकर देखी तो उसमें हीरे-जवाहरात भरे थे। वह खुशी से नाचने लगा और पोटली लेकर चला गया।
लक्ष्मी जी हैरान रह गईं। उन्होंने पाया कि यह व्यक्ति झूठा, चोर और शराबी है, जो निरंतर गलत कर्म करता है। फिर भी ईश्वर ने उसे कृपा के योग्य क्यों समझा? उन्होंने नारायण की ओर देखा पर वे अब भी आँखें बंद किए हुए मग्न थे।
तभी लक्ष्मी जी ने एक और व्यक्ति को आते देखा। वह बहुत गरीब लगता था, पर उसके चेहरे पर तेज और संतोष झलक रहा था। उसके कपड़े साफ थे पर पुराने। अचानक उसके पैर में एक बहुत बड़ा कांटा, चुभ गया। खून बहने लगा। उसने साहस करके कांटा निकाला, पैर में गमछा बाँधा, प्रभु को हाथ जोड़कर धन्यवाद दिया और लंगड़ाता हुआ आगे बढ़ गया।
इतने अच्छे व्यक्ति की यह दशा देख लक्ष्मी जी को पीड़ा हुई। उन्होंने पाया कि नारायण अब भी आँखें बंद किए पड़े हैं। अपने भक्त के साथ यह भेदभाव उन्हें स्वीकार नहीं हुआ। उन्होंने नारायण जी को हिलाकर जगाया। नारायण आँखें खोलकर मुस्कराए। लक्ष्मी जी ने उस घटना का रहस्य पूछा।
नारायण ने उत्तर दिया, ‘लोग मेरी कार्यशैली नहीं समझते। मैं किसी को न सुख देता हूँ, न दुःख। मनुष्य अपने कर्मों का फल स्वयं पाता है। यूँ समझो, मैं एक लेखाकार हूँ, मैं केवल हिसाब रखता हूँ कि किस कर्म के लिए, कब और किस जन्म में, पाप या पुण्य के अनुसार क्या फल मिलेगा।’
जिस अधर्मी को सोने की पोटली मिली, उसे वास्तव में पूर्व जन्म के सुकर्मों के कारण पूरा राज्य मिलने वाला था पर इस जन्म में किए गए विकर्मों से वह फल घटकर केवल एक पोटली रह गया।
और जिस भले व्यक्ति के पैर में शूल चुभा, उसे पूर्व जन्म के पापों के कारण शूली यानी फाँसी मिलनी थी पर इस जन्म के पुण्य कर्मों से शूली शूल में बदल गई।”
ज्ञानी को काँटा चुभे तो उसे कष्ट और पीड़ा होती है, पर वह दुःखी नहीं होता। वह परमात्मा को दोष नहीं देता बल्कि हर तकलीफ को प्रभु की इच्छा मानकर उसमें भी किसी भलाई को देखता है और कष्ट सहते हुए भी ईश्वर का धन्यवाद करता है।
