■ गोरेगांव-बांगुर नगर में श्रीराम कथा

● मुंबई
गोरेगाँव पश्चिम स्थित बांगुर नगर के लक्ष्मी सरस्वती ग्राउंड पर चंद्रकांत गुप्ता एवं चमेली देवी गुप्ता के पावन संकल्प से, पूज्य राजन महाराज के व्यासत्व में रामकथा सेवा समिति द्वारा आयोजित नौ दिवसीय रामकथा महोत्सव में रामजन्मोत्सव के प्रसंग के अंतर्गत पूज्य राजन महाराज ने भावपूर्ण रामकथा गायन किया।
उन्होंने कहा कि रामजी के जन्म के उपरांत अयोध्या में घर-घर उत्सव मनाए जा रहे थे। इसका एकमात्र कारण यह था कि जो राजा अपनी प्रजा को पुत्रवत प्रेम करता है, उसकी प्रजा राजा के हर उत्सव और पर्व को अपना मानकर उसमें सहभागी बनती है।
राजन महाराज ने कहा कि मृत्यु संसार का अटल सत्य है। जिसने इस सत्य को स्वीकार कर लिया, उसके जीवन की अनेक समस्याएँ स्वयं समाप्त हो जाती हैं। किंतु विडंबना यह है कि लोग इस सत्य को जानते हुए भी स्वीकार नहीं करते और संसार को सदा के लिए अपना मान लेते हैं।
उन्होंने कहा कि अयोध्या में आनंद के सागर स्वयं भगवान के रूप में प्रकट हुए हैं और सागर अथाह होता है, इसलिए अयोध्या के सुख और आनंद का पूर्ण वर्णन संभव नहीं है। रामनवमी के दिन अयोध्या में संपूर्ण धरती के सभी तीर्थ उपस्थित हो जाते हैं। अतः रामनवमी के दिन अयोध्या पहुँचने वाले श्रद्धालु को सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य फल सहज रूप से प्राप्त होता है।

मानस के संदर्भ में उन्होंने कहा कि अयोध्यावासी भगवान शंकर से भी अधिक सौभाग्यशाली हैं, क्योंकि जिन रामजी के दर्शन के लिए भगवान शिव को अशुभ वेष धारण करना पड़ा, वही रामजी अयोध्या में अवतरित हुए। अयोध्यावासियों को न केवल भगवान के दर्शन का, बल्कि उनके जन्मोत्सव को मनाने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ।
उन्होंने बताया कि रामजी का प्राकट्य दिन में हुआ था। चंद्रमा को अपने नाम से जोड़कर वे रामचंद्र कहलाए, इसीलिए भगवान शिव ने चंद्रमा को सदा के लिए अपने मस्तक पर धारण कर लिया।
श्रोताओं की अपार भीड़ को प्रेमसूत्र प्रदान करते हुए पूज्य राजन महाराज ने कहा, “जीवन के विपत्तिकाल में जहाँ अर्थ काम नहीं आता, वहाँ परम अर्थ अवश्य काम आता है। इसलिए सभी को परम अर्थ का भी संग्रह करना चाहिए।”
बाललीला, नामकरण सहित अन्य प्रसंगों का सुंदर वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपने संस्कारों का संरक्षण और पालन करना चाहिए, क्योंकि अपने संस्कारों की पूँजी खो देने वाला समाज नष्ट हो जाता है। रामकथा के क्रम में विश्वामित्र मुनि का यज्ञ-रक्षा हेतु अयोध्या आगमन होता है। चक्रवर्ती महाराज, गुरु वशिष्ठ के कहने पर भगवान राम और लक्ष्मण को मुनि विश्वामित्र के साथ बक्सर भेजते हैं। भगवान राम और लक्ष्मण ताड़का, सुबाहु सहित राक्षसों का संहार कर यज्ञ की रक्षा करते हैं।
कथा के भजन क्रम में पूज्य राजन महाराज का लोकप्रिय भजन “राजा जी खजनवा दे द, रानी जी गहनवा दे द” सुनकर श्रोताओं का विशाल जनसमूह झूमने, थिरकने और नृत्य करने लगा।
