■ सूर्यकांत उपाध्याय

रेनू की शादी हुए पाँच साल हो गए थे।
उसके पति कम बोलने वाले थे, पर बहुत सुशील और संस्कारी थे। सास-ससुर माता-पिता जैसे थे, एक छोटी-सी ननद थी और एक नन्ही-सी परी। घर में खुशियों से भरा-पूरा परिवार था। दिन खुशी-खुशी बीत रहे थे।
आज रेनू बीते दिनों को याद कर रही थी। उसे याद आया कि कैसे उसके पिताजी ने बिना माँगे अपने दामाद के नाम 30 लाख रुपये कर दिए थे, ताकि उनकी बेटी सुखी रहे। कैसे उसके माता-पिता ने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की थी। रेनू का विवाह बहुत ही आनंदमय ढंग से संपन्न हुआ था।
पर बात यह नहीं थी। असली बात यह थी कि रेनू के बड़े भाई ने अपने ही माता-पिता को घर से निकाल दिया था। पैसे तो उनके पास बचे नहीं थे। जो थे, उन्होंने रेनू की शादी में लगा दिए थे। फिर भला ऐसे में बच्चे माँ-बाप को क्यों रखने लगे?
रेनू के माता-पिता एक मंदिर में रुके हुए थे। रेनू आज उनसे मिलकर आई थी और तब से बहुत उदास थी।
आखिर वह बेटी थी, अपने माता-पिता का दुख उसे कैसे नहीं सताता? कितने अच्छे से उसे पाला था। उसके पिताजी ने तो उसे अपनी गुड़िया बनाकर रखा था।
आज वही माता-पिता मंदिर के किसी कोने में भूखे-प्यासे पड़े थे।
रेनू अपने पति से बात करना चाहती थी कि क्या वह अपने माता-पिता को घर ले आए, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। उसके पति कम बोलते थे, अधिकतर चुप ही रहते थे।
किसी तरह रात हुई। रेनू का पति और पूरा परिवार खाने की मेज पर बैठा था। रेनू की आँखें सहमी हुई थीं।
डरते-डरते उसने अपने पति से कहा-“सुनिए जी, भैया-भाभी ने मम्मी-पापा को घर से निकाल दिया है। वे मंदिर में पड़े हैं। अगर आप कहें तो मैं उन्हें घर ले आऊँ।”
रेनू के पति ने कुछ नहीं कहा। खाना खत्म कर वे अपने कमरे में चले गए। बाकी लोग अभी खाना खा रहे थे, लेकिन रेनू के मुँह से एक निवाला भी नहीं उतरा। बस यही चिंता थी, अब क्या होगा?
रेनू रुंधी हुई आँखों से सबको खाना परोसती रही।
थोड़ी देर बाद उसके पति कमरे से बाहर आए और रेनू के हाथ में नोटों का एक बंडल देते हुए बोले, “इससे मम्मी-डैडी के लिए एक घर खरीद दो और उनसे कहना कि वे किसी बात की फ़िक्र न करें, मैं हूँ।”
रेनू ने घबराकर कहा “इतने पैसे कहाँ से आए जी?”
उसके पति बोले- “ये तुम्हारे पापा के दिए हुए ही पैसे हैं। ये मेरे नहीं थे, इसलिए मैंने इन्हें हाथ तक नहीं लगाया। वैसे भी उन्होंने ये पैसे मुझे जबरदस्ती दिए थे, शायद उन्हें पता था कि एक दिन ऐसा आएगा।”
रेनू के सास-ससुर अपने बेटे को गर्व भरी नजरों से देखने लगे। बेटे ने उनसे कहा, “अम्मा जी, बाबूजी, सब ठीक है न?”
वे बोले, “बड़ा नेक ख़याल है बेटा। हम तुम्हें बचपन से जानते हैं। अगर बहू अपने माता-पिता को अपने घर ले आए, तो वे शर्म के मारे सिर नहीं उठा पाएँगे। बेटी के घर रहकर वे जी नहीं पाएँगे। इसलिए तुमने उनके लिए अलग घर दिलाने का फ़ैसला किया, यह बहुत सही है। रही बात दहेज के पैसों की, तो हमें कभी उनकी जरूरत नहीं पड़ी। तुमने हमें कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी।”
यह कहकर वे दोनों रेनू और उसके पति को छोड़ सोने चले गए।
रेनू के पति ने फिर कहा- “अगर और पैसों की ज़रूरत पड़े तो मुझे बताना। और अपने माता-पिता को यह मत बताना कि घर खरीदने के पैसे कहाँ से आए। कोई बहाना कर देना, नहीं तो वे खुद को दिल-ही-दिल में कोसते रहेंगे। अच्छा, अब मैं सोने जा रहा हूँ, सुबह दफ़्तर जाना है।”
वह कमरे में चला गया।
रेनू खुद को कोसने लगी। न जाने मन में उसने क्या-क्या सोच लिया था कि उसके पति दहेज के पैसे ले चुके हैं, कि वे मदद नहीं करेंगे। अब उसे अपनी सोच पर शर्म आ रही थी।
रेनू समझ चुकी थी कि उसके पति कम बोलते हैं, लेकिन बहुत गहराई से समझते हैं।
वह उठी और अपने पति के पास गई, माफी माँगने। उसने अपने मन की सारी बातें कह दीं।
उसके पति मुस्कराकर बोले-“कोई बात नहीं। तुम्हारी जगह मैं होता, तो शायद यही सोचता।”
रेनू की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था- एक ओर उसके माता-पिता की परेशानी दूर हुई, दूसरी ओर उसके पति ने उसे माफ कर दिया।
हर पुरुष बुरा नहीं होता…!
