
● मुंबई
मुंबई महानगरपालिका चुनाव में मतदान की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही है, वैसे-वैसे चुनावी सरगर्मी तेज होती जा रही है। उम्मीदवारों ने घर-घर संपर्क, नुक्कड़ सभाओं और प्रत्यक्ष संवाद के जरिए मतदाताओं तक पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई है। इस चुनावी सक्रियता के बीच टोपी, बिल्ले, बैनर, झंडे और अन्य प्रचार सामग्री की मांग अचानक बढ़ गई है, जिसका सीधा असर कीमतों पर दिख रहा है।
चुनाव आयोग द्वारा तय की गई 15 लाख रुपये की अधिकतम खर्च सीमा के भीतर रहकर प्रचार करना प्रत्याशियों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। प्रचार सामग्री के दाम बढ़ने से बजट संतुलन बिगड़ रहा है और कई उम्मीदवारों को प्रचार के तरीकों पर दोबारा विचार करना पड़ रहा है।
राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय दलों के उम्मीदवारों को स्थायी चुनाव चिन्ह का लाभ मिल रहा है। वे एक जैसी प्रचार सामग्री थोक में मंगवा रहे हैं, जिससे लागत अपेक्षाकृत नियंत्रित रहती है। इसके उलट, अपक्ष उम्मीदवारों को अलग-अलग चुनाव चिन्ह मिलने के कारण अपने प्रतीक को पहचान दिलाने के लिए विशेष रूप से तैयार टी-शर्ट, टोपियां और बिल्ले छपवाने पड़ रहे हैं, जिससे उनका खर्च कहीं अधिक बढ़ गया है।
चुनावी रैलियों, चौक सभाओं और कॉर्नर मीटिंग्स में कार्यकर्ताओं की मौजूदगी दिखाना भी प्रत्याशियों की प्राथमिकता बनी हुई है। मगर दिनभर के प्रचार के दौरान कार्यकर्ताओं के आवागमन, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं का खर्च कई उम्मीदवारों के लिए सिरदर्द साबित हो रहा है।
इसके साथ ही, प्रतिदिन चुनाव आयोग को प्रचार खर्च का विस्तृत विवरण सौंपने की अनिवार्यता ने प्रचार प्रबंधन को और जटिल बना दिया है। कई प्रत्याशियों ने अनुमति, दस्तावेज़ी औपचारिकताओं और खर्च के लेखा-जोखा के लिए अलग से कर्मियों की नियुक्ति की है।
बढ़ता चुनावी खर्च, सख्त आचार संहिता और मतदाताओं तक पहुंचने की तीव्र होड़ ने मुंबई मनपा चुनाव को उम्मीदवारों के लिए केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रबंधन की भी बड़ी परीक्षा बना दिया है।
