■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक संत महाराज किसी कार्य से एक कस्बे में पहुँचे। रात्रि में रुकने के लिए वे कस्बे के एक मंदिर में गए, लेकिन वहाँ उनसे कहा गया कि वे इस कस्बे का कोई ऐसा व्यक्ति साथ लाएँ जो उन्हें जानता हो, तभी उन्हें ठहरने दिया जाएगा।
उस अनजान कस्बे में उन्हें कौन जानता था? दूसरे मंदिरों और धर्मशालाओं में भी यही समस्या सामने आई। अब संत महाराज परेशान हो गए। रात काफी हो चुकी थी और वे सड़क किनारे खड़े थे। तभी एक व्यक्ति उनके पास आया।
उसने कहा, “मैं आपकी समस्या से परिचित हूँ, लेकिन मैं आपकी गवाही नहीं दे सकता, क्योंकि मैं इस कस्बे का नामी चोर हूँ। यदि आप चाहें तो मेरे घर पर रुक सकते हैं। आपको कोई परेशानी नहीं होगी।”
संत महाराज बड़े असमंजस में पड़ गए। एक चोर के यहाँ रुकना, अगर कोई जान गया तो क्या सोचेगा? लेकिन कोई दूसरा उपाय भी नहीं था। मजबूरी में यह सोचकर वे उसके यहाँ रुकने को तैयार हो गए कि अगले दिन कोई और व्यवस्था कर लेंगे।
चोर उन्हें घर छोड़कर अपने काम, यानी चोरी के लिए निकल गया। सुबह लौटकर आया तो वह बड़ा प्रसन्न था। उसने स्वामी जी को बताया कि आज कोई दाँव नहीं लग सका, लेकिन अगले दिन अवश्य लगेगा।
चोर होने के बावजूद उसका व्यवहार बहुत अच्छा था, इसी कारण संत महाराज उसके यहाँ एक महीने तक रुके। वह प्रत्येक रात चोरी के लिए जाता, लेकिन पूरे महीने उसका दाँव नहीं लगा। फिर भी वह प्रसन्न रहता। उसे दृढ़ विश्वास था कि आज नहीं तो कल उसका दाँव अवश्य लगेगा। पूरे एक माह बाद उसे एक बड़ा अवसर हाथ लगा।
महात्मा जी ने सोचा कि यह चोर कितना दृढ़ निश्चयी है। उसे स्वयं पर अटूट विश्वास है, जबकि हम लोग थोड़ी-सी असफलता से ही विचलित हो जाते हैं। यदि हमारी भी ऐसी ही दृढ़ता और विश्वास हो, तो सफलता निश्चित है।
