■ सूर्यकांत उपाध्याय

सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थीं। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उनके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था।
अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की, किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आए, क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं; उनके पास जाने में किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।
रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर जब लक्ष्मण युद्धभूमि में जाने के लिए प्रस्तुत हुए, तब राम ने उनसे कहा, “लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।
परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना, मेघनाद का मस्तक किसी भी प्रकार भूमि पर न गिरे। वह एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है। ऐसी साध्वी के पति का मस्तक यदि पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी समस्त सेना का ध्वंस हो जाएगा और विजय की आशा त्यागनी पड़ेगी।”
लक्ष्मण अपनी सेना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। अपने बाणों से मेघनाद का मस्तक उतार लिया पर उसे पृथ्वी पर गिरने नहीं दिया। हनुमान वह मस्तक रघुनंदन के पास ले आए।
मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास आकर गिरी। सुलोचना चकित रह गई। अगले ही क्षण अत्यंत दुःख से कातर होकर विलाप करने लगी, परंतु उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, संभव है यह भुजा किसी अन्य व्यक्ति की हो; ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष लगेगा।
निर्णय करने के लिए उसने भुजा से कहा, “यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे।”
दासी ने भुजा में लेखनी पकड़ा दी। भुजा ने लिख दिया, “प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है। युद्धभूमि में श्रीराम के भ्राता लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। उन्होंने वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा का त्याग किया है। वे तेजस्वी और समस्त दैवी गुणों से संपन्न हैं। संग्राम में उनके साथ मेरी एक न चली। अंततः उन्हीं के बाणों से विद्ध होकर मेरा प्राणांत हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।”
पति की भुजा द्वारा लिखी पंक्तियाँ पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गई। पुत्रवधू का विलाप सुनकर लंकापति रावण आए और बोले, “शोक न कर, पुत्री। प्रातः होते ही सहस्रों मस्तक मेरे बाणों से कटकर पृथ्वी पर लोटेंगे। मैं रक्त की नदियाँ बहा दूँगा।”
करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली, “इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी? सहस्रों नहीं, करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के अभाव की पूर्ति नहीं कर सकते।”
सुलोचना ने निश्चय किया कि अब वह सती होगी। किंतु पति का शव तो राम-दल में था। उसने रावण से अपना अभिप्राय प्रकट कर शव मँगवाने का आग्रह किया। रावण ने कहा, “देवी, तुम स्वयं राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बाल ब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेंद्रिय लक्ष्मण और एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हों, वहाँ जाने से भय नहीं करना चाहिए।”
सुलोचना के आगमन का समाचार सुनते ही श्रीराम स्वयं उठकर उनके पास आए और बोले, “देवी, तुम्हारे पति विश्व के अद्वितीय योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें अनेक सद्गुण थे, किंतु विधि की लिखी को कौन बदल सकता है?”
सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी, तब श्रीराम ने कहा, “देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है। अपने आने का कारण बताओ।”
सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से कहा—
“राघवेंद्र, मैं सती होने के लिए अपने पति का मस्तक लेने आई हूँ।”
श्रीराम ने ससम्मान मेघनाद का शीश मँगवाकर उन्हें सौंप दिया।
छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय द्रवित हो उठा। उसने लक्ष्मण से कहा, “सुमित्रानंदन, यह मत समझना कि मेघनाद का वध किसी की व्यक्तिगत शक्ति से हुआ। यह दो पतिव्रता नारियों का विधान था।”
सुग्रीव ने जिज्ञासावश पूछा कि उन्हें यह सब कैसे ज्ञात हुआ। सुलोचना ने उत्तर दिया, “मेरे पति की भुजा युद्धभूमि से उड़कर मेरे पास आई थी। उसी ने यह सब लिखकर बताया।”
व्यंग्य में सुग्रीव बोले, “यदि निर्जीव भुजा लिख सकती है, तो यह कटा हुआ सिर भी हँस सकता है।”
श्रीराम ने कहा, “पतिव्रता की महिमा को मत लघु करो।”
सुलोचना ने कहा, “यदि मैं मन, वचन और कर्म से अपने पति को देव मानती हूँ, तो यह मस्तक हँसे।”
इतना कहते ही मस्तक हँस उठा। सभी विस्मित रह गए और सुलोचना को प्रणाम किया।
प्रस्थान करते समय सुलोचना ने प्रार्थना की कि आज युद्ध स्थगित रहे। श्रीराम ने अनुमति दे दी। सुलोचना पति का शीश लेकर लंका लौटी। समुद्र तट पर चंदन की चिता रची गई। पति का शीश गोद में रखकर सुलोचना चिता पर बैठीं और कुछ ही क्षणों में सती हो गईं।
