
■ धीरज मिश्र
सनातन परंपरा में मौनी अमावस्या का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। यह दिन भगवान शिव को समर्पित होता है, जब गंगा स्नान कर शिव और विष्णु की भक्ति भाव से आराधना की जाती है। इसी दिन पितरों के श्राद्ध, तर्पण और मौन साधना का भी विधान है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।
इस वर्ष शुक्रवार 16 जनवरी को मासिक शिवरात्रि का पर्व है, जो प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। शिवरात्रि के अगले दिन अमावस्या पड़ती है, इसी कारण माघ अमावस्या यानी मौनी अमावस्या की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के मन में भ्रम की स्थिति बनी हुई थी कि यह पर्व 17 जनवरी को मनाया जाए या 18 जनवरी को।
वैदिक पंचांग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि गुरुवार 15 जनवरी की रात 08 बजकर 17 मिनट से प्रारंभ होकर शुक्रवार 16 जनवरी की रात 10 बजकर 21 मिनट पर समाप्त होगी। इसी तिथि में प्रदोष काल के दौरान भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा की जाती है, इसलिए 16 जनवरी को प्रदोष व्रत रहेगा।
इसके बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 16 जनवरी की रात 10 बजकर 21 मिनट से शुरू होकर 18 जनवरी की रात 12 बजकर 03 मिनट तक रहेगी। मासिक शिवरात्रि चतुर्दशी तिथि की निशा काल पूजा के कारण 16 जनवरी को ही मनाई जाएगी। इसके उपरांत अमावस्या तिथि का आगमन होगा।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनिवार 17 जनवरी को दिन भर चतुर्दशी तिथि प्रभावी रहेगी, जिसका समापन देर रात 18 जनवरी को होगा। चूंकि अमावस्या उदया तिथि से मान्य होती है, इसलिए मौनी अमावस्या का पर्व रविवार 18 जनवरी को मनाना शास्त्रसम्मत और श्रेष्ठ माना गया है।
विशेष बात यह है कि मौनी अमावस्या के दिन हर्षण योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और शिववास योग जैसे कई शुभ संयोग बन रहे हैं। इन योगों में पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और साधकों पर पितृ कृपा बनी रहती है। ऐसे में 18 जनवरी को मौन, स्नान, दान और साधना का विशेष फल प्राप्त होगा।
