■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक व्यक्ति अपनी गुस्सैल पत्नी से तंग आकर उसे कीलों से भरा एक थैला देते हुए समझाता है, “तुम्हें जब भी क्रोध आए, इस थैले में से एक कील निकालना और प्लॉट की दीवार में ठोंक देना।”
पत्नी को अगले दिन जैसे ही क्रोध आया, उसने एक कील प्लॉट की दीवार में ठोंक दी। यह प्रक्रिया वह लगातार करती रही।
धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगा कि कील ठोंकने की व्यर्थ मेहनत करने से अच्छा अपने क्रोध पर नियंत्रण करना है। क्रमशः कील ठोंकने की संख्या कम होती गई।
एक दिन ऐसा भी आया कि पत्नी ने पूरे दिन एक भी कील नहीं ठोंकी।
उसने खुशी-खुशी यह बात अपने पति को बताई। वे बहुत प्रसन्न हुए और बोले, “जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम एक बार भी क्रोधित नहीं हुई, उस दिन ठोंकी हुई कीलों में से एक कील निकाल लेना।”
पत्नी ऐसा ही करने लगी। एक दिन ऐसा भी आया कि दीवार में एक भी कील नहीं बची। उसने खुशी-खुशी यह बात अपने पति को बताई।
पति पत्नी को दीवार के पास ले गए और कीलों के छेद दिखाते हुए पूछा, “क्या तुम ये छेद भर सकती हो?”
पत्नी ने कहा,“नहीं जी।”
पति ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “अब समझो, क्रोध में तुम्हारे द्वारा कहे गए कठोर शब्द दूसरे के दिल में ऐसे ही छेद कर देते हैं, जिनकी भरपाई भविष्य में कभी नहीं हो सकती।”
जब भी आपको क्रोध आए, तो सोचिएगा कि कहीं आप भी किसी के दिल में कील ठोंकने तो नहीं जा रहे?
भर जाता है घाव तलवार का, बोली का घाव नहीं भरता।
