■ सूर्यकांत उपाध्याय

वह भूख से मर रही थी…
बिना यह जाने कि जिस ढाबे में वह
बचा-खुचा भोजन तलाशने आई है,
वही ढाबा उसकी किस्मत की दिशा
सदा के लिए बदल देगा।
पेट की भूख भीतर से इस तरह गुर्रा रही थी,
मानो कोई आवारा कुत्ता पसलियों के बीच कैद हो।
ठंड से हाथ सुन्न पड़ चुके थे।
मैं फुटपाथ पर धीरे-धीरे चल रही थी—
रास्ते के ढाबों और रेस्टोरेंटों की रोशनी में
झाँकती हुई।
गरम रोटियों, मसालों और घी की सुगंध
ऐसी चुभ रही थी कि ठंड से भी अधिक पीड़ा दे रही थी।
जेब में एक भी रुपया नहीं था।
काफी साहस जुटाकर अंततः
मैं एक ढाबे के भीतर प्रवेश कर गई।
तवे पर सिकती रोटियों की आवाज़
और उबलती दाल की महक से
आँखें अनायास भर आईं।
मैं इधर-उधर इस तरह देखने लगी,
जैसे किसी परिचित को ढूँढ रही हूँ—
जबकि सच तो यह था कि मेरी दृष्टि
किसी ऐसी मेज़ पर टिकी थी,
जहाँ भोजन का कुछ अंश शेष रह गया हो।
और वह मिल गई।
एक प्लेट
जिसमें थोड़ी-सी दाल बची थी,
आधी रोटी का टूटा हुआ टुकड़ा
और चावल के कुछ दाने चिपके थे।
मैं तुरंत वहाँ बैठ गई।
स्वयं को ग्राहक दिखाने का
असफल अभिनय करते हुए
बचे हुए भोजन को खाने लगी।
रोटी ठंडी थी,
दाल सूख चुकी थी…
पर उस क्षण
मेरे लिए वह अमृत से कम नहीं थी।
“अरे, सुनो!”
पीछे से आई एक भारी, गंभीर आवाज़ ने
मुझे ठिठका दिया।
“यह ठीक नहीं है!”
मैं सन्न रह गई।
मुँह में जो था, उसे जल्दी से निगल लिया
और सिर झुका लिया।
मन ने मान लिया
अब अपमान होगा,
डाँट पड़ेगी,
शायद भगा दिया जाऊँ।
“माफ़ कीजिए, साहब…”
मैंने बहुत धीमे स्वर में कहा,
फटी हुई शॉल की जेब में
रोटी का टुकड़ा छुपाने की
असफल कोशिश करते हुए
“बस… बहुत भूख लगी थी।”
वह व्यक्ति अत्यंत सलीके में था
साफ़ कुर्ता-पायजामा,
ऊपर से जैकेट,
चमकते जूते।
ऐसे जूते,
जिनकी क़ीमत शायद
मेरी पूरी ज़िंदगी की कमाई से
भी अधिक रही होगी।
और मैं
गंदे स्वेटर,
फटे जूतों
और उलझे बालों में
खड़ी थी।
“मेरे साथ आओ।”
उसने संक्षेप में कहा।
डर के मारे
मैं एक कदम पीछे हट गई।
“मैंने चोरी नहीं की…
कसम से।”
मेरी आवाज़ काँप रही थी।
“बस खाने दीजिए,
फिर चली जाऊँगी।”
उसने कुछ उत्तर नहीं दिया।
केवल गंभीर दृष्टि से मुझे देखा।
फिर हाथ उठाकर वेटर को संकेत किया
और स्वयं दूसरी मेज़ पर जाकर बैठ गया।
मैं कुछ भी समझ नहीं पाई।
हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
तभी वेटर आया
और मेरे सामने
एक भरी हुई थाली रख दी
गरम चावल,
ताज़ी दाल,
सब्ज़ी,
दो फूली हुई रोटियाँ…
और एक स्टील का गिलास
गरम दूध।
“ये… मेरे लिए है?”
मैंने अविश्वास से पूछा।
वेटर मुस्कराया
और चुपचाप सिर हिला दिया।
मैंने नज़र उठाकर
उस व्यक्ति की ओर देखा।
वह दूर बैठा,
शांत भाव से
मुझे देख रहा था।
संकोच से भरी
मैं उसके पास गई।
आँखों में आँखें डालने का
साहस नहीं हो पा रहा था।
“आपने…
आपने मुझे खाना क्यों दिया?”
उसने जैकेट उतारी,
कुर्सी पर रखी
और इतनी सहजता से कहा
कि मेरा हृदय
भीतर तक भीग गया
“क्योंकि किसी भी इंसान को
ज़िंदा रहने के लिए
जूठी प्लेटें खंगालने की
मजबूरी नहीं होनी चाहिए।
जब भी तुम्हें भूख लगे,
यहाँ आ जाना।
यहाँ तुम्हें हमेशा
गरम खाना मिलेगा।
मैं इस ढाबे का मालिक हूँ
और आज से
यह बात कभी नहीं बदलेगी।”
मेरे पास शब्द नहीं थे।
कंठ अवरुद्ध हो गया।
मैंने दोनों हाथों से
चेहरा ढक लिया
और फूट-फूटकर रो पड़ी
भूख से।
लज्जा से।
और कृतज्ञता से।
