■ सूर्यकांत उपाध्याय

बात कुछ इस तरह है कि जब श्री रामकृष्ण परमहंस जी को कैंसर हुआ था, तब बीमारी के कारण वे भोजन नहीं कर पाते थे। अपने गुरु की इस अवस्था को देखकर स्वामी विवेकानंद जी अत्यंत चिंतित रहते थे।
एक दिन परमहंस जी ने पूछा-
“नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद जी)! क्या तुझे वे दिन याद हैं, जब तू अपने घर से मेरे पास मंदिर आता था और दो-दो दिन तक कुछ खाया नहीं होता था? तब तू अपनी मां से झूठ कह देता था कि तूने अपने मित्र के घर भोजन कर लिया है, ताकि तेरी गरीब मां थोड़े-बहुत भोजन को तेरे छोटे भाई को परोस दे। है ना?”
स्वामी विवेकानंद जी ने रोते-रोते हां में सिर हिला दिया।
परमहंस जी आगे बोले-
“और जब तू यहां मंदिर में मेरे पास आता था, तो अपने चेहरे पर खुशी का मुखौटा ओढ़ लेता था। लेकिन मैं भी कम नहीं था। झट जान जाता था कि तेरे पेट में चूहों का पूरा कबीला धमा-चौकड़ी मचा रहा है, तेरा शरीर भूख से चूर हो रहा है। तब मैं तुझे अपने हाथों से लड्डू, पेड़े, मक्खन और मिश्री खिलाता था। है ना?”
स्वामी विवेकानंद जी ने सुबकते हुए हां में गर्दन हिला दी।
अब रामकृष्ण परमहंस जी मुस्कुराए और पूछा-
“मैं यह सब कैसे जान लेता था? कभी सोचा है तूने?”
स्वामी विवेकानंद जी ने सिर उठाकर परमहंस जी की ओर देखा। परमहंस जी ने फिर पूछा-
“बता न, मैं तेरी आंतरिक स्थिति कैसे जान लेता था?”
स्वामी विवेकानंद जी बोले-
“क्योंकि आप अंतर्यामी हैं, ठाकुर।”
परमहंस जी-
“अंतर्यामी… अंतर्यामी किसे कहते हैं?”
स्वामी विवेकानंद जी-
“जो सबके भीतर की जान ले।”
परमहंस जी-
“और कोई भीतर की भावना कब जान सकता है?”
स्वामी विवेकानंद जी-
“जब वह स्वयं भीतर ही विराजमान हो।”
परमहंस जी-
“यानि मैं तेरे भीतर भी बैठा हूं, है ना?”
स्वामी विवेकानंद जी-
“जी बिल्कुल! आप मेरे हृदय में समाए हुए हैं।”
परमहंस जी बोले-
“तेरे भीतर समाकर मैं हर बात जान लेता हूं, हर दुख-दर्द पहचान लेता हूं, तेरी भूख का अहसास कर लेता हूं। तो क्या तेरी भूख मुझ तक नहीं पहुंचती होगी?”
स्वामी विवेकानंद जी-
“मेरी भूख… आप तक?”
रामकृष्ण परमहंस जी-
“हां, तेरी भूख! जब तू भोजन करता है और तुझे तृप्ति होती है, क्या वह मुझे तृप्त नहीं करती होगी? अरे पगले! गुरु अंतर्यामी है, अंतर-जगत का स्वामी है। वह अपने शिष्य के भीतर बैठकर सब कुछ भोगता है। एक नहीं, हजारों मुखों से खाता हूं-तेरे, लाटू के, काली के, गिरीश के… सबके। याद रखना, गुरु कोई बाहर स्थित देह मात्र नहीं है। वह तुम्हारे रोम-रोम का वासी है। तुम्हें पूरी तरह आत्मसात कर चुका है। अलगाव कहीं है ही नहीं। अगर कल को मेरी यह देह नहीं भी रही, तब भी मैं जिऊंगा-तेरे जरिए जिऊंगा। मैं तुझमें रहूंगा और तू मुझमें।”
ऐसा कहते हुए रामकृष्ण परमहंस जी ने अपना शरीर त्याग दिया।
