■ सूर्यकांत उपाध्याय

प्राचीन काल में तक्षशिला के महाविद्यालय में पापक नामक एक विद्यार्थी पढ़ता था। उसके मित्र उसे पापक नाम से पुकारते थे। पापक प्रतिदिन अपना अशुभ नाम सुनकर लज्जित होता था। एक दिन उसने आचार्य से कहा,
“भगवन्! ‘पापक’ नाम से मेरा गौरव नष्ट होता है। आपने मेरा अच्छा नाम क्यों नहीं रखा?”
आचार्य ने शांत भाव से कहा,
“पापक के स्थान पर मैं तुम्हारा दूसरा नाम रख दूँगा, किंतु उससे पहले तुम गाँवों में जाकर अपने लिए एक अच्छा नाम खोजकर आओ।”
पापक गाँव-गाँव घूमता हुआ एक स्थान पर पहुँचा। वहाँ कुछ लोग एक मृत व्यक्ति को श्मशान ले जा रहे थे। पापक ने पूछा,
“अरे भाई, किसकी मृत्यु हो गई?”
एक व्यक्ति ने उत्तर दिया, “इस गाँव का अमरपाल मर गया है।”
पापक चकित होकर सोचने लगा कि नाम अमरपाल, फिर भी मृत्यु! तभी वहाँ खड़े एक व्यक्ति ने कहा, “नाम से क्या होता है? इस संसार में कोई अजर-अमर नहीं है।”
इसके बाद वह सार्थक नाम की खोज में आगे बढ़ा। उसने देखा, सिर पर बोझ रखे एक स्त्री आ रही थी। उसका नाम धनपाली था। पापक ने उसका कार्य पूछा। स्त्री ने कहा, “मैं नौकरी करती हूँ।”
पापक ने आश्चर्य से कहा, “आप धनपाली होकर भी निर्धन हैं?”
स्त्री मुस्कराकर बोली, “नाम से क्या होता है? संसार कर्मप्रधान है।”
पापक आगे बढ़ा। दूसरे गाँव में उसने देखा कि सिपाही एक चोर को पकड़कर ला रहे हैं। चोर का नाम धर्मपाल था। एक भिक्षुक भिक्षा माँग रहा था, उसका नाम लखपति था। एक मूर्ख का नाम विद्याधर था और एक नग्न साधु का नाम पीताम्बरदास था। कहीं एक व्यक्ति खाट पर पड़ा अपने शरीर को खुजला रहा था, उसका नाम निर्मलदास था।
इस प्रकार घूमते-घूमते पापक ने अनुभव किया कि नाम से किसी की महिमा नहीं बढ़ती। वह लौटकर आचार्य के पास गया और बोला,
“भगवन्! मैं अनेक स्थानों पर गया, किंतु कहीं भी उपयुक्त नाम नहीं मिला। मैंने देखा कि नाम से किसी का गौरव नहीं बढ़ता। अमरपाल भी मर गया, धनपाली निर्धन है, धर्मपाल चोर है, विद्याधर मूर्ख है, पीताम्बरदास नग्न है और निर्मलदास रोगी है।”
आचार्य मुस्कराए और बोले,
“पुत्र! तुम्हें यही समझाने के लिए मैंने तुम्हें भेजा था। मनुष्य नाम से नहीं, अपने कर्म और चरित्र से सिद्धि प्राप्त करता है। संसार में चरित्रवान और कर्मशील व्यक्तियों की ही प्रशंसा होती है। नाम चाहे साधारण हो, जो उत्तम कर्म करता है वही प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।”
यह सत्य समझकर पापक प्रसन्न हुआ और आगे चलकर उसने गृहस्थ धर्म में प्रवेश किया।
