■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक समय की बात है। एक राज्य में एक न्यायप्रिय राजा राज करता था। एक दिन सुबह-सुबह राजा ने दाढ़ी बनवाने के लिए महल के नाई को बुलाया। उस दिन नाई कुछ अधिक घबराया हुआ था। वह अपने उस्तरे को चमड़े पर बार-बार घिसकर तेज कर रहा था। बाहर से वह सामान्य दिख रहा था, पर उसके मन में अनेक विचार चल रहे थे।
दरअसल, राज्य के मंत्री और रानी ने उसे लालच देकर एक षड्यंत्र में शामिल कर लिया था। उन्होंने कहा था कि जब राजा दाढ़ी बनवाने बैठे, तब वह उस्तरे से उनका गला काट दे। बदले में उसे अपार धन देने का वादा किया गया था। लालच में आकर नाई मान गया, पर राजा के सामने पहुँचते ही उसका साहस डगमगा गया।
राजा शांत भाव से बैठा था। तभी उसकी नजर दीवार पर लिखी कविता की पंक्तियों पर पड़ी और वह उन्हें ऊँचे स्वर में पढ़ने लगा “घिसती रही घिसाती रही घिस-घिस लगाती,
पानी की जो बात तुमने करनी है, वह मैंने जानी।”
राजा तो केवल कविता पढ़ रहा था, पर नाई को लगा कि उसकी साजिश पकड़ी गई है। डर के मारे उसके हाथ काँपने लगे। राजा को संदेह हुआ और उसने कठोर स्वर में कहा, “नाई, दाढ़ी ठीक से बना।”
यह सुनते ही नाई घबरा गया और बोला, “महाराज, मुझे क्षमा करें, मैं अपराधी हूँ।” राजा ने सख्ती से पूछा तो वह उनके चरणों में गिर पड़ा और सारी सच्चाई बता दी।
राजा ने धैर्य रखते हुए सैनिकों को बुलाया और मंत्री व रानी को दरबार में प्रस्तुत करने का आदेश दिया। नाई को चेतावनी देकर राज्य छोड़ने को कहा। दरबार में षड्यंत्र उजागर हुआ और दोषियों को दंड मिला।
राजा ने कवि को सम्मानित करते हुए कहा, “तुम्हारी कविता ने मेरी जान बचाई।”
इस प्रकार सिद्ध हुआ कि साधारण शब्द भी कभी-कभी बड़े संकट टाल देते हैं।
