■ सूर्यकांत उपाध्याय

टॉल्सटॉय ने एक कहानी लिखी है कि रूस में एक झील के किनारे तीन फकीरों का नाम बहुत प्रसिद्ध हो गया था। लोग लाखों की तादाद में उनके दर्शन करने जाने लगे। वे फकीर अत्यंत मूढ़ थे, बिल्कुल अनपढ़ थे। उन्हें धर्म का कोई ज्ञान नहीं था। यह खबर रूस के आर्च प्रीस्ट, अर्थात् सबसे बड़े ईसाई पुरोहित, तक पहुँची। उसे बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि ईसाई चर्च विधिवत प्रक्रिया से ही लोगों को संत घोषित करता है; तभी वे संत माने जाते हैं।
यह भी बड़ी रोचक बात है कि ईसाई चर्च घोषणा करता है कि फलाँ व्यक्ति संत हुआ। जब पोप इसकी पुष्टि कर देता है, तभी वह संत माना जाता है। इसलिए ईसाइयत में कई बार ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति के मृत्यु के दो–दो सौ, तीन–तीन सौ वर्ष बाद उसे संत घोषित किया जाता है। जीवित लोगों को तो कई बार चर्च ने दंडित भी किया। जॉन ऑफ आर्क को जीवित अवस्था में जला दिया गया, और सैकड़ों वर्षों बाद उसे संत घोषित किया गया।
रूस में यह प्रश्न उठा कि ये फकीर संत कैसे हो गए। आर्च प्रीस्ट स्वयं इसकी जांच करने पहुँचा। वह मोटरबोट से झील में गया। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि वे तीनों एक पेड़ के नीचे बैठे हैं। वे सीधे-सादे ग्रामीण प्रतीत होते थे। उसे देखकर उन्होंने झुककर नमस्कार किया और उसके चरण छुए।
आर्च प्रीस्ट ने उन्हें डांटा और पूछा कि वे इतनी भीड़ क्यों इकट्ठी करते हैं। उन्होंने विनम्रता से कहा कि वे किसी को नहीं बुलाते, लोग स्वयं आ जाते हैं। उसने उनकी प्रार्थना के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि वे अनपढ़ हैं और उन्होंने अपनी एक छोटी-सी प्रार्थना बना ली है- “यू आर थ्री, वी आर थ्री, हैव मर्सी ऑन अस।” अर्थात् आप भी तीन हैं, हम भी तीन हैं, हम पर कृपा करें।
पादरी ने इसे गलत बताया और उन्हें अधिकृत प्रार्थना सिखाई। वे उसे बार-बार दोहराकर याद करने लगे। पादरी लौटने लगा, पर बीच झील में उसने देखा कि वे तीनों पानी पर दौड़ते हुए उसकी ओर आ रहे हैं। वे पास आकर बोले कि वे नई प्रार्थना भूल गए हैं, कृपया फिर से बता दें।
यह देखकर पादरी चकित रह गया। उसने कहा, “तुम अपनी ही प्रार्थना करते रहो। वही सही है।”
■ यह कथा बताती है कि परमात्मा का अनुभव किसी औपचारिकता या अधिकृत विधि का मोहताज नहीं होता। सच्ची श्रद्धा, सरलता और आंतरिक अनुभूति ही परमात्मा तक पहुँचने का वास्तविक मार्ग है।
