■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक विद्यार्थी अपने गुरु के पास पहुँचा। उसकी आँखों में निराशा थी। उसने कहा,
“गुरुजी, मैं दिन-रात मेहनत करता हूँ, फिर भी मुझे सफलता नहीं मिलती। कई बार मन करता है कि सब छोड़ दूँ।”
गुरुजी उसे शांत भाव से बाहर ले गए और आँगन में लगे एक छोटे से पौधे की ओर इशारा किया। बोले, “क्या तुम जानते हो, जब यह पौधा लगाया गया था, तब कई दिनों तक जमीन के ऊपर कुछ भी दिखाई नहीं देता था? लोग समझते थे कि बीज खराब है, लेकिन सच यह था कि वह मिट्टी के भीतर अपनी जड़ें फैला रहा था।”
गुरुजी ने आगे कहा, “यदि जड़ें गहरी और मजबूत न हों, तो हल्की-सी आँधी भी पौधे को गिरा देती है। तुम्हारी मेहनत भी ऐसी ही है। अभी परिणाम दिखाई नहीं दे रहा, क्योंकि तुम्हारी जड़ें मजबूत हो रही हैं। जब समय आएगा, तो तुम्हारी सफलता भी सबको दिखाई देगी।”
विद्यार्थी की आँखों में नई चमक आ गई। उसने समझ लिया कि असली विकास अक्सर भीतर ही भीतर होता है, जो तुरंत दिखाई नहीं देता।
