■ सूर्यकांत उपाध्याय

यह उत्तराखण्ड के पवित्र धाम केदारनाथ की घाटी में प्रचलित एक लोककथा है, जिसे बुजुर्ग आज भी सत्य मानते हैं।
बहुत समय पहले एक यात्री केदारनाथ यात्रा पर आया। उसने श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान केदारनाथ के दर्शन किए और लौटते समय सोनप्रयाग के पास पहुँचा। तभी उसे पता चला कि उसके सारे रुपए कहीं गिर गए हैं। उसका घर बहुत दूर था और बिना पैसों के वहाँ पहुँचना असंभव था। वह अत्यंत चिंतित हो गया और कई लोगों से मदद माँगी, लेकिन कोई भी सहायता करने को तैयार नहीं हुआ।
अंत में पास के एक गाँव में रहने वाले शिवम नाम के एक सरल और दयालु व्यक्ति ने उसकी मदद की। शिवम उस यात्री को अपने घर ले गया, उसे भोजन कराया और कुछ रुपए देकर उसकी सहायता की। जाते समय यात्री ने वचन दिया, “मैं जल्दी ही आपके सारे पैसे लौटा दूँगा।”
समय बीतता गया, लेकिन वह यात्री कभी वापस नहीं आया। धीरे-धीरे शिवम भी उस घटना को भूल गया।
कुछ वर्षों बाद शिवम ने खेती के काम के लिए एक जोड़ी बैल खरीदी। उन बैलों के आने से उसके घर में खुशहाली आ गई। खेती अच्छी होने लगी और परिवार सुखपूर्वक रहने लगा। लेकिन यह सुख अधिक समय तक नहीं टिक पाया। एक दिन खेत में चरते समय बायाँ बैल अचानक गिर पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई।
अब शिवम को नया बैल खरीदना पड़ा। उसने एक और बैल खरीदा, लेकिन नई जोड़ी पहले जैसी नहीं रही। नया बैल जवान था, जबकि पुराना दायाँ बैल धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा था। उसकी ताकत कम होती गई और वह बीमार रहने लगा।
एक दिन एक अनजान व्यक्ति शिवम के घर आया और पूछा, “क्या आप शिवम हैं?”
शिवम ने कहा, “हाँ, मैं ही हूँ।”
उस व्यक्ति ने फिर पूछा, “क्या आपने कभी किसी यात्री को पैसे उधार दिए थे?”
शिवम ने थोड़ा सोचकर उत्तर दिया, “हाँ, बहुत समय पहले मैंने एक यात्री की मदद की थी, लेकिन वह कभी पैसे लौटाने नहीं आया।”
तब वह व्यक्ति बोला, “मैं उसी यात्री का बेटा हूँ। केदारनाथ से लौटने के बाद मेरे पिता की मृत्यु हो गई थी। मरने से पहले वे कुछ कहना चाहते थे, लेकिन कह नहीं पाए। कुछ दिन पहले मुझे एक सपना आया, जिसमें उन्होंने बताया कि उन्होंने आपसे पैसे उधार लिए थे, जो वे चुका नहीं पाए।”
शिवम आश्चर्य से सुनता रहा।
वह व्यक्ति आगे बोला, “उन्होंने यह भी बताया कि उसी कर्ज को चुकाने के लिए उन्होंने आपके घर में बैल के रूप में जन्म लिया। उन्होंने वर्षों तक आपकी सेवा की और अधिकतर कर्ज चुका दिया। अब वे बहुत कमजोर और बीमार हो गए हैं, इसलिए उन्होंने मुझे आदेश दिया कि मैं बाकी का कर्ज चुका दूँ, ताकि उन्हें इस जीवन से मुक्ति मिल सके।”
यह सुनकर शिवम स्तब्ध रह गया। उस व्यक्ति ने शेष रुपए शिवम को दे दिए। जैसे ही शिवम ने पैसे अपने हाथ में लिए, उसी क्षण उसका बीमार बैल अंतिम सांस लेकर मर गया।
शिवम की आँखों में आँसू आ गए। उसे समझ में आ गया कि यह सब कर्मों का फल था। उस बैल ने वास्तव में अपना कर्ज चुका दिया था और अब उसे मुक्ति मिल गई थी।
● शिक्षा- यह कथा हमें सिखाती है कि इस संसार में हर कर्म का फल अवश्य मिलता है। कोई भी ऋण, वचन या कर्म अधूरा नहीं रहता; उसे हर हाल में चुकाना पड़ता है, चाहे वह इस जन्म में पूरा हो या अगले जन्म में। इसलिए हमें सदैव अच्छे कर्म करने चाहिए, किसी का लिया हुआ ऋण समय पर चुका देना चाहिए, अपने वचनों का पालन करना चाहिए और दूसरों के साथ सद्भाव बनाए रखना चाहिए।
