■ सूर्यकांत उपाध्याय

वृन्दावन में एक संत रहते थे, जिन्हें लोग प्रेम से ग्वारिया बाबा कहते थे। उनका श्री बांके बिहारी जी से ऐसा सखा भाव था कि वे ठाकुर जी को अपना यार कहकर पुकारते थे। यह केवल शब्द नहीं थे, उनके हृदय का सच्चा भाव था।
बाबा प्रतिदिन बिहारी जी को शयन करवाने मंदिर जाया करते थे। एक दिन मार्ग में उन्हें ताजे मोदकों की सुगंध आई। उन्होंने चार मोदक बिहारी जी के लिए ले लिए। वृन्दावन में ठाकुर जी के भक्तों का बड़ा सम्मान होता है, इसलिए दुकानदार ने प्रेम से मोदक दे दिए।
जब बाबा मंदिर पहुंचे, तब भोग के पट बंद हो चुके थे। वे शांत भाव से अपना कम्बल बिछाकर बैठ गए और ध्यान में लीन हो गए। उसी समय शयन आरती का समय हो गया, लेकिन आश्चर्य यह कि मंदिर का द्वार खुल ही नहीं रहा था। पुजारी बार-बार प्रयास कर रहे थे, पर सफलता नहीं मिली।
वहाँ बैठे एक संत ने संकेत किया कि ग्वारिया बाबा से पूछो। पुजारी ने बाबा से कहा, “बाबा, तुम्हारा यार दरवाजा क्यों नहीं खोल रहा?” बाबा तुरंत उठे और मुस्कुराकर बोले, “जय जय! अब खोलो।”
जैसे ही पुजारी ने द्वार को स्पर्श किया, वह सहज ही खुल गया। आरती संपन्न हुई और ठाकुर जी को शयन करवाया गया।
बाद में पुजारी ने बाबा से इसका रहस्य पूछा। बाबा हंसकर बोले, “जब आप द्वार खोलने का प्रयास कर रहे थे, तब बिहारी जी मेरे पास बैठकर मोदक खा रहे थे। आपने जल्दी आवाज दे दी, उनका मुख भी साफ नहीं हो पाया।”
पुजारी ने मंदिर में जाकर देखा तो सचमुच ठाकुर जी के मुख पर मोदक के चिह्न लगे थे। यह देखकर वे भावविभोर हो उठे।
