
▪️मुंबई
देश में मॉनसून की प्रगति जारी है और इसके दिल्ली पहुंचने की तैयारी के बीच मौसम वैज्ञानिकों की वह आशंका भी सच साबित हो गई है, जिसका कई महीनों से इंतजार था। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने पुष्टि कर दी है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति विकसित हो चुकी है और आने वाले महीनों में इसके और मजबूत होने की संभावना है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इसका भारत के मौसम और आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है।

अल नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जो तब बनती है जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह बदलाव केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के कई देशों के मौसम चक्र को प्रभावित करता है। भारत में इसका संबंध आमतौर पर कमजोर मॉनसून, कम वर्षा, अधिक तापमान और सूखे जैसी परिस्थितियों से जोड़ा जाता रहा है।
आईएमडी के जून 2026 के ईएनएसओ और इंडियन ओशन डाइपोल (आईओडी) बुलेटिन के अनुसार, मध्य और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान अल नीनो की निर्धारित सीमा को पार कर चुका है। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि वातावरण ने समुद्र के बढ़ते तापमान पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि समुद्री और वायुमंडलीय प्रणाली अब पूरी तरह अल नीनो की अवस्था में प्रवेश कर चुकी है।

मौसम विभाग का अनुमान है कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान अल नीनो और अधिक प्रभावी हो सकता है। हालांकि भारतीय महासागर डाइपोल फिलहाल तटस्थ स्थिति में बना रहने की संभावना है, फिर भी अल नीनो का असर वर्षा के वितरण और तापमान पर दिखाई दे सकता है।
इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अल नीनो के संभावित प्रभावों को लेकर सतर्क रहने की सलाह दे चुके हैं। नीति आयोग की बैठक में उन्होंने जल संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बताते हुए राज्यों से जल प्रबंधन को मजबूत करने का आह्वान किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अल नीनो मजबूत हुआ तो कृषि, जल संसाधनों और बिजली की मांग पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
