➡️ जैविक प्रयोगशालाओं (बायोलैब्स) को वित्तीय सहायता पर बवाल

◾ वाशिंगटन
अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गैबार्ड ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि अमेरिका ने पिछले कई वर्षों में 30 से अधिक देशों में संचालित 120 से ज्यादा जैविक प्रयोगशालाओं (बायोलैब्स) को वित्तीय सहायता प्रदान की है। हाल ही में सार्वजनिक किए गए सरकारी दस्तावेजों के आधार पर सामने आई इस जानकारी ने जैविक अनुसंधान कार्यक्रमों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
राष्ट्रीय खुफिया निदेशक कार्यालय के अनुसार, इन प्रयोगशालाओं में कई ऐसे अनुसंधान किए गए जिनका संबंध खतरनाक और तेजी से फैलने वाले रोगजनकों (पैथोजन्स) से था। इनमें तथाकथित ‘गेन-आफ-फंक्शन’ रिसर्च भी शामिल है, जिसमें वायरस या अन्य सूक्ष्मजीवों की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है। गैबार्ड का कहना है कि ऐसे कुछ शोध कार्यक्रमों पर पर्याप्त निगरानी नहीं रखी गई थी।
उन्होंने बताया कि प्रशासन अब संबंधित अमेरिकी एजेंसियों और साझेदार देशों के साथ मिलकर इन प्रयोगशालाओं की समीक्षा करेगा। इसके तहत यह पता लगाया जाएगा कि विभिन्न लैब्स में किन-किन रोगजनकों पर काम किया गया और वर्तमान में वहां कौन-से जैविक नमूने मौजूद हैं।

गैबार्ड ने यह भी संकेत दिया कि ट्रंप प्रशासन जैविक अनुसंधान से जुड़ी नीतियों में बदलाव पर विचार कर रहा है। विशेष रूप से उन शोध परियोजनाओं की समीक्षा की जाएगी जिन्हें संभावित रूप से जोखिमपूर्ण माना जाता है। प्रशासन का उद्देश्य ऐसे अनुसंधानों पर अधिक पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन में 40 से अधिक प्रयोगशालाएं सोवियत काल से जुड़े जैविक रोगजनकों के अध्ययन और प्रबंधन में शामिल रही हैं। इन प्रयोगशालाओं में एंथ्रेक्स, इबोला, सार्स, मर्स और प्लेग जैसे गंभीर रोगों से संबंधित शोध होने की जानकारी सामने आई है।

हालांकि इन दावों और दस्तावेजों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, लेकिन इस खुलासे ने वैश्विक जैव सुरक्षा, अनुसंधान निगरानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
