▪️ अभय मिश्र

मुंबई शहर हादसों का ही नहीं, वड़ा-पाव, सुंदर समुद्र और अपनी संस्कृति के प्रति जागरूक लोगों के अलावा भूल-भुलैया के लिए भी प्रसिद्ध है। न, न वो मनोरंजन वाला भूल-भुलैया नहीं, अपने सामान भूल जाने वाला भूल-भुलैया। वर्ष 2024 में छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर 64 हजार शिकायतें सामान गुम होने, लोकल ट्रेन में लगभग 11 हजार मोबाइल खोने और मेट्रो में प्रतिदिन 227 सामान भूल जाने की शिकायतें दर्ज होने की बात सामने आई है। हालांकि पुलिस या संबंधित विभाग में सूचना देने पर देर-सबेर अधिकतर मामलों में खोया सामान मिल भी जाता है। यह भी मिलता-जुलता किस्सा है।
गर्मी चरमपंथियों की तरह तांडव मचा रही थी। पेड़ और इमारतों की छांव से चलते-चलते स्टेशन का रुख किया। दरअसल, शहर से उपनगर की ओर लौट रहा था। चर्चगेट स्टेशन पहुंचा। रेल नीर ने मेरी प्यास बुझाई। ट्रेन आने तक बनियान और शर्ट पूरी तरह पसीने से भीग चुका था। ट्रेन में चढ़ गया। धीमी लोकल में विंडो सीट का औचित्य नहीं रह गया है। अब विंडो सीट न मिलने का दुख नहीं होता क्योंकि अब सबके पास मोबाइल है। सौभाग्यवश मुझे विंडो सीट ही मिली लेकिन मैंने मोबाइल जेब में रखा और अपनी पुस्तक पढ़ने लगा।
जब ट्रेन चलने लगती तो हवा लगती। थोड़ा सुकून मिलता। तभी मेरे सामने खड़ा एक यात्री ट्रेन के अचानक चलने से मुझपर ही गिर पड़ा। उसके हाथ में कुछ सामान था। उसका रंग मेरे कपड़े पर लग गया। बेचारा बहुत शर्मिंदा हुआ। मैंने ‘कोई बात नहीं’ वाली औपचारिकता तो निभा दी लेकिन मन मसोस कर रह गया क्योंकि वह मेरी फेवरेट शर्ट थी।
मैंने सोचा कैसे-कैसे लोग हैं यार!
धीरे-धीरे गंतव्य पास आ रहा था। भीड़ कम होने लगी थी। आखिरी स्टेशन भी आ गया।हवाई जहाज हो या ट्रेन, मैं उतरने की जल्दबाजी में नहीं रहता। भेंड़-बकरियों की तरह कौन जाए? मैं बैठा ही रहा। अब लगभग सब लोग उतर गए थे। ट्रेन से उतरनेवाला आखिरी व्यक्ति मैं ही था। देखा तो कोई सद्गृहस्थ अपने दायित्व निर्वहन में चूके हुए दिखे। स्मृतिभ्रंश के कारण, मोबाइल देखने के कारण या किसी अन्य कारण से एक महाशय कम से कम दो किलो करेले की थैली ट्रेन की लगेज रैक पर रखकर भूल गए थे।
मैंने सोचा कैसे-कैसे लोग हैं यार!
अस्तु; मैं अपने घर पहुंचा। अपनी पत्नी और बेटे के सामने थोड़ी होशियारी बघारी। उस आदमी द्वारा मेरा शर्ट खराब करने के बावजूद मेरा उसे क्षमा कर देनेवाला किस्सा सुनाकर घरवालों से अपनी महानता का गुणगान करवाया। फिर ट्रेन में करेला भूल कर जाने वाले उन महाशय की कमियां गिनाईं कि कैसे-कैसे लोग हैं!
बहुत हल्का महसूस हुआ। वास्तव में यह मानवीय स्वभाव है। किसी की बुराई करके अहंकार पुष्ट होता है और किसी का बखान करके सकारात्मक ऊर्जा एक्टिव होती है। वास्तव में किसी की बुराई करके उसके प्रति पूर्वधारणा बना लेना सर्वथा अनुचित है। लेकिन आमरा मानुष जाति, की कोरबो!
घर पर उन दोनों लोगों की बुराई करके गहरी सांस ली ही थी, मन प्रसन्न हुआ ही था कि मुझे कुछ याद आया। मुझे याद आया कि मैं अपनी पुस्तक ‘तितली’ (जयशंकर प्रसाद) ऑटोरिक्शा में ही भूल चुका हूं।
कैसे-कैसे लोग हैं यार …!
