- हर मरम्मत के पीछे छिपा होता है अनुभव, धैर्य और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवन संदेश

▪️ मुंबई
आज के उपभोक्तावादी दौर में जब किसी वस्तु के खराब होते ही उसे बदल देना सामान्य बात मानी जाती है, तब घर के कई पिता ऐसे होते हैं जो टूटी हुई कुर्सी, पुरानी घड़ी, खराब रेडियो, साइकिल या किसी घरेलू सामान को फेंकने के बजाय उसे ठीक करने में जुट जाते हैं। अक्सर परिवार के लोग इसे कंजूसी समझ लेते हैं, लेकिन मनोविज्ञान इस व्यवहार को एक अलग दृष्टि से देखता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, वस्तुओं की मरम्मत करने की आदत केवल पैसे बचाने का प्रयास नहीं होती। इसके पीछे यादों को सुरक्षित रखने, जिम्मेदारी निभाने और परिवार के प्रति अपने जुड़ाव को अभिव्यक्त करने की भावना भी काम करती है। कई पिता उन वस्तुओं को इसलिए संभालकर रखते हैं क्योंकि वे उनके जीवन के महत्वपूर्ण पलों, संघर्षों और पारिवारिक स्मृतियों से जुड़ी होती हैं।
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि पिता अक्सर स्वयं को परिवार का समस्या-समाधानकर्ता मानते हैं। किसी टूटी वस्तु को ठीक करना उनके लिए केवल तकनीकी काम नहीं, बल्कि यह संदेश देने का माध्यम भी होता है कि कठिनाइयों का सामना धैर्य और कौशल से किया जा सकता है। यह आत्मनिर्भरता और जिम्मेदारी की भावना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है।
मरम्मत की संस्कृति पर्यावरण और समाज दोनों के लिए लाभकारी मानी जाती है। वस्तुओं को नया जीवन देने से अपशिष्ट कम होता है और संसाधनों की बचत होती है। साथ ही यह लोगों को वस्तुओं के वास्तविक मूल्य और उनसे जुड़े भावनात्मक संबंधों को समझने का अवसर भी देती है।
इसलिए अगली बार यदि कोई पिता किसी पुरानी वस्तु को फेंकने के बजाय उसे ठीक करने में समय लगाता दिखाई दे, तो संभव है कि वह केवल एक सामान नहीं बचा रहा हो, बल्कि उससे जुड़ी यादों, अनुभवों और पारिवारिक विरासत को भी सहेज रहा हो। यही कारण है कि कई बार मरम्मत करना कंजूसी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का प्रतीक बन जाता है।
(साभार -इकोनॉमिक्स टाइम्स )
