▪️सूर्यकांत उपाध्याय

अंतिम सांसें गिन रहे जटायु ने मानो यह संदेश दिया कि उन्हें पता था कि वे रावण को पराजित नहीं कर पाएंगे, फिर भी वे लड़े। यदि वे संघर्ष न करते, तो आने वाली पीढ़ियां उन्हें कायर कहतीं।
जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट दिए, तब भी उन्होंने मृत्यु से कहा, ‘ठहरो! जब तक मैं माता सीता का समाचार प्रभु श्रीराम को नहीं सुना देता, तब तक तुम मुझे स्पर्श नहीं कर सकती।’ प्रतीकात्मक रूप से कहा जाता है कि मृत्यु भी उनकी अटूट इच्छा-शक्ति के आगे ठहर गई।
दूसरी ओर, महाभारत में भीष्म पितामह इच्छा-मृत्यु के वरदान के बावजूद बाणों की शय्या पर पड़े रहे। यह दृश्य रामायण और महाभारत के दो अलग-अलग संदेशों को सामने लाता है। रामायण में जटायु प्रभु श्रीराम की गोद में अंतिम क्षण बिताते हैं, जबकि महाभारत में भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर अपने अंतिम समय की प्रतीक्षा करते हैं।
लोकमान्यता के अनुसार, इस अंतर का कारण उनके कर्म बताए जाते हैं। जटायु ने माता सीता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। दूसरी ओर, भीष्म पितामह ने कौरव सभा में द्रौपदी के अपमान का प्रत्यक्ष विरोध नहीं किया। यद्यपि वे धर्म को जानते थे, फिर भी परिस्थितियोंवश अन्याय के विरुद्ध निर्णायक रूप से खड़े नहीं हो सके। इसी कारण अनेक लोग उनके जीवन से यह शिक्षा ग्रहण करते हैं कि अन्याय के प्रति मौन रहना भी एक प्रकार का दोष माना जाता है।
जटायु का जीवन त्याग, साहस और नारी सम्मान का प्रतीक है। उन्होंने परिणाम की चिंता किए बिना धर्म का साथ दिया और अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वहीं भीष्म पितामह का प्रसंग यह स्मरण कराता है कि केवल धर्म का ज्ञान पर्याप्त नहीं, बल्कि समय आने पर उसके पक्ष में खड़ा होना भी आवश्यक है।
- शिक्षा: अन्याय का साहसपूर्वक विरोध करना चाहिए। सत्य कुछ समय के लिए कठिनाइयों में पड़ सकता है, लेकिन अंततः उसकी पराजय नहीं होती।
