▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

उस दिन सुबह छह बजे मैं अपने शहर से दूसरे शहर जाने के लिए निकला। जब रेलवे स्टेशन पहुँचा, तब तक मेरी ट्रेन निकल चुकी थी। अब मेरे पास सुबह 9:30 बजे की ट्रेन का ही विकल्प था।
मैंने सोचा कि तब तक कहीं नाश्ता कर लिया जाए। मुझे बहुत तेज़ भूख लगी थी। मैं एक होटल की ओर जा ही रहा था कि अचानक मेरी नज़र फुटपाथ पर बैठे दो बच्चों पर पड़ी। दोनों की उम्र लगभग 10-12 वर्ष रही होगी। उनकी हालत बेहद दयनीय थी। भूख और कमजोरी के कारण उनके शरीर की हड्डियाँ साफ़ दिखाई दे रही थीं। छोटा बच्चा बड़े से खाने की ज़िद कर रहा था और बड़ा उसे चुप कराने की कोशिश कर रहा था। यह दृश्य देखकर मेरे कदम वहीं ठिठक गए।
पहले तो मैंने उन्हें 10 रुपए देकर आगे बढ़ना चाहा, लेकिन अगले ही पल मन ने मुझे धिक्कारा। लगा, इतने पैसों से उनका क्या होगा? मैं तुरंत वापस लौटा और उनसे पूछा, ‘बेटा, कुछ खाओगे?’ दोनों ने संकोच के साथ हामी भर दी।
मैं उन्हें पास के होटल में ले गया। उनके मैले कपड़े देखकर होटल वाला उन्हें डाँटकर भगाने लगा। मैंने उससे कहा, ‘भाई साहब, इन्हें जो खाना है, दे दीजिए। पैसे मैं दूँगा।’ यह सुनकर उसके चेहरे के भाव बदल गए। बच्चों ने नाश्ता, मिठाई और लस्सी माँगी। मैं स्वयं उनके लिए सब लेकर आया। उन्हें तृप्त होकर खाते और मुस्कुराते देख जो संतोष मिला, उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
नाश्ते के बाद मैंने उनसे कहा, ‘जो पैसे मैंने दिए हैं, उनसे एक रुपए का शैम्पू लेकर हैंडपंप पर नहा लेना और दोपहर-शाम का भोजन पास के मंदिर में लगने वाले लंगर में कर लेना।’
स्टेशन लौटते समय मन भारी था। रास्ते में मंदिर दिखा तो मैंने मन ही मन कहा, ‘हे भगवान! आप कहाँ हैं? इन मासूम बच्चों की ऐसी हालत देखकर भी आप मौन कैसे रह सकते हैं?’
तभी भीतर से जैसे एक आवाज़ आई, ‘पुत्र, अभी तक उन्हें भोजन कौन करा रहा था? क्या तुम्हें लगता है कि यह सब केवल तुम्हारी इच्छा से हुआ?’
मैं स्तब्ध रह गया। लगा जैसे स्वयं ईश्वर ने मेरे प्रश्नों का उत्तर दे दिया हो। उसी क्षण समझ में आ गया कि हम केवल निमित्तमात्र हैं। वास्तविक कर्ता तो वही परमात्मा है।
▪️शिक्षा: जब ईश्वर किसी ज़रूरतमंद की सहायता करना चाहता है, तो वह किसी न किसी को माध्यम बनाता है। इसलिए जहाँ भी अवसर मिले, सहायता से पीछे न हटें। हो सकता है, उस क्षण ईश्वर ने आपको ही अपना निमित्त चुना हो।
