▪️जानें इसका धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व

▪️ मुंबई
उत्तर भारत की प्रमुख नदियों में शामिल सतलुज नदी का उल्लेख भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में ‘शुतुद्रि’ नाम से मिलता है। वैदिक साहित्य में इसे जीवनदायिनी और पवित्र नदी के रूप में वर्णित किया गया है। ऋग्वेद के प्रसिद्ध नदी सूक्त में गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु सहित अनेक नदियों के साथ शुतुद्रि का भी उल्लेख मिलता है, जो उस समय की सभ्यता और संस्कृति में इसके महत्वपूर्ण स्थान को दर्शाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सतलुज नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि आस्था और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। इसके तटों पर प्राचीन काल से अनेक ऋषि-मुनियों ने तपस्या की और वैदिक संस्कृति का विकास हुआ। यही कारण है कि हिंदू परंपरा में इस नदी को विशेष सम्मान प्राप्त है।
- ऋग्वेद में ‘शुतुद्री’ के नाम से वर्णित है सतलुज नदी
ऋग्वेद में सतलुज नदी का उल्लेख ‘शुतुद्री’ (Śutudrī) नाम से मिलता है। ऋग्वेद, मंडल 3, सूक्त 33 में ऋषि विश्वामित्र ने विपाशा (ब्यास) और शुतुद्री का वर्णन करते हुए कहा है- ‘प्र पर्वतानामुशती उपस्थादश्वे इव विषिते हासमाने।
गावेव शुभ्रे मातरा रिहाणे विपाश् शुतुद्री पयसा जवेते॥’ (ऋग्वेद 3.33.1)

इसी प्रकार ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 75 (नदी सूक्त), मंत्र 5 में भी शुतुद्री का अन्य पवित्र नदियों के साथ उल्लेख मिलता है। वैदिक विद्वानों के अनुसार ‘शुतुद्री’ ही वर्तमान सतलुज नदी है, जो प्राचीन भारत की संस्कृति, सभ्यता और वैदिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
भौगोलिक दृष्टि से सतलुज पंजाब की पाँच प्रमुख नदियों में सबसे लंबी है। इसका उद्गम तिब्बत के मानसरोवर-राक्षसताल क्षेत्र के निकट माना जाता है। यह हिमाचल प्रदेश और पंजाब से होकर पाकिस्तान में प्रवेश करती है और अंततः सिंधु नदी तंत्र में मिल जाती है। आज भी यह नदी सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
