▪️ दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने दिखाई हरित नवाचार की मिसाल
- नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज के छात्रों ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनोखी उपलब्धि हासिल की है। छात्रों ने केले के छिलकों को उपयोगी ‘इको-लेदर’ में बदलने की तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में पारंपरिक चमड़े का टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बन सकता है। इस नवाचार का उद्देश्य कृषि और खाद्य अपशिष्ट को उपयोगी उत्पाद में बदलकर प्रदूषण कम करना और सतत विकास को बढ़ावा देना है।

छात्रों के अनुसार, सामान्यतः फेंक दिए जाने वाले केले के छिलकों में मौजूद प्राकृतिक रेशों और जैविक तत्वों का उपयोग विशेष प्रक्रिया से किया गया। इसके बाद तैयार सामग्री को इस तरह विकसित किया गया कि वह दिखने और उपयोग में चमड़े जैसी प्रतीत हो। यह पूरी प्रक्रिया पशु-आधारित चमड़े की तुलना में अधिक पर्यावरण-अनुकूल मानी जा रही है और इससे जैविक कचरे का बेहतर उपयोग भी संभव होगा।
इस परियोजना का उद्देश्य केवल एक नया उत्पाद बनाना नहीं, बल्कि युवाओं में ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की सोच को बढ़ावा देना भी है। छात्रों का मानना है कि यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया जाए तो इससे फैशन और एक्सेसरी उद्योग को टिकाऊ विकल्प मिल सकता है, साथ ही कृषि अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन में भी मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे नवाचार भविष्य में हरित अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ-साथ प्रदूषण और अपशिष्ट की समस्या कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। केला उत्पादक देश होने के कारण भारत में इस तरह की तकनीक के व्यावसायिक उपयोग की भी व्यापक संभावनाएं हैं।
