▪️पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

‘आओ सत्यमेव जयते कहें और करें सद्कर्म।
सार्थक हो जाए सृष्टि पर आना जनम-जनम।
यूँ तो विश्व के सभी धर्मग्रंथ कर्मप्रधान हैं,
परंतु गीता का आगमन और उद्गम सर्वप्रथम।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म।
फल की चिंता न करो, कर्म है मानव धर्म।
कर्म करो, बस कर्म करो।’
पंडित मुस्तफा आरिफ कृत ‘गीता भारती : भगवद्गीता हिंदी मुक्तक में’ का प्रारंभ भगवद्गीता के प्रथम अध्याय की इन पंक्तियों से होता है और समापन अठारहवें अध्याय की इन पंक्तियों से-
‘जहाँ कृष्ण का मार्गदर्शन…
न मैं संजय, न अर्जुन हूँ और न कोई बुद्धिमान।
मैं जगत का एक सूक्ष्म प्राणी हूँ, न ही मैं महान।
मैं पंडित मुस्तफा हूँ, कृष्ण-कृपा और प्रेम में बँधा हुआ।
भगवद्गीता से प्रेरित ‘गीता भारती’ का यह अनुष्ठान रचा है।
परिश्रम करो कठोर, करो निष्काम कर्म…’
श्रीमद्भगवद्गीता विश्व के सर्वाधिक पवित्र ग्रंथों में से एक है। महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो दिव्य उपदेश दिया, वही आगे चलकर ‘भगवद्गीता’ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। द्वापर युग से लेकर आज तक यह ग्रंथ असंख्य संत-महात्माओं और सामान्य जन का पथ-प्रदर्शक रहा है। मीरा, सूरदास, चैतन्य महाप्रभु से लेकर महात्मा गांधी तक ने गीता से जीवन की प्रेरणा प्राप्त की। गांधीजी ने कहा था, ‘जब मुझे संदेह घेर लेते हैं, निराशा सामने खड़ी हो जाती है और आशा की कोई किरण दिखाई नहीं देती, तब मैं गीता की शरण लेता हूँ। उसका कोई न कोई श्लोक मुझे संबल देता है और मेरे चेहरे पर मुस्कान लौट आती है।’
मुंबई निवासी पंडित मुस्तफा आरिफ ने 700 संस्कृत श्लोकों वाली भगवद्गीता का सार 786 सरल हिंदी मुक्तकों में प्रस्तुत किया है, ताकि सामान्य पाठक भी गीता के संदेश को सहजता से समझ सके। पुस्तक की भूमिका ‘गीता भारती अनुष्ठान’ में वे लिखते हैं-
‘गुणों के बंधन से मुक्त हो, सांसारिक डोर तू छोड़।
निर्द्वंद्व होकर मुक्त बन, सत्त्वगुण से नाता जोड़।
सुख-दुख, लाभ-हानि से ऊपर उठ आत्मा को पहचान।
महान वही बनते हैं, इस सत्य को कभी न छोड़।’
भगवद्गीता के 700 संस्कृत श्लोकों का सरल हिंदी मुक्तकों में काव्यात्मक रूपांतरण अत्यंत कठिन कार्य था। पंडित मुस्तफा आरिफ ने इस चुनौती को सफलतापूर्वक पूरा किया है। पुस्तक की संपादक प्रिया उपाध्याय ने इसे ‘आध्यात्मिक यात्रा का नया अध्याय’ कहा है। डॉ. शोभना तिवारी ने उन्हें ‘सद्भाव के आध्यात्मिक संवाहक’ की संज्ञा दी है। लेखक पवन सेठी के अनुसार, ‘गीता भारती’ ने कृष्ण-वाणी को भाषा, संस्कृति और समय के अनुरूप नया स्वर दिया है। मुरलीधर चांदनीवाला इसे दो धर्मों के बीच सेतु बनाने वाला कालजयी प्रयास मानते हैं। मौलाना मोहम्मद बुरहानुद्दीन कासमी के शब्दों में, ‘गीता भारती पवित्र छंदों के माध्यम से आत्माओं को जोड़ने वाला सेतु है।’ वहीं लेखक एवं समीक्षक आशीष दशोत्तर ने इसे जीवन की चुनौतियों से जूझने का शाश्वत मार्ग बताया है।
कृतिकार मुस्तफा आरिफ के अनुसार भगवद्गीता का मूल संदेश कर्म है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवता को निष्काम कर्म, स्वधर्म और आत्मकल्याण का मार्ग बताया है। गीता के सभी अठारह अध्याय इसी सत्य को स्थापित करते हैं कि कर्म ही जीवन का आधार है। जब लक्ष्य स्पष्ट हो, आचरण पवित्र हो और स्वधर्म का मार्ग अपनाया जाए, तब सफलता और विजय निश्चित होती है।
पंडित मुस्तफा आरिफ ने ‘गीता भारती’ को अपने गुरु सांदीपनि को श्रद्धापूर्वक समर्पित किया है। इससे पूर्व वे कुरआन शरीफ की आयतों पर आधारित ‘एक है तू, एक है’ नामक 10,000 पदों का हिंदी काव्य-ग्रंथ भी लिख चुके हैं। वे स्वयं को आध्यात्मिक रचनाकार मानते हैं, जिनकी रचनाधर्मिता का आधार विभिन्न धर्मग्रंथों में निहित कालजयी मूल्यों की खोज है। उनके अनुसार कर्म ही मानव और समस्त सृष्टि के कल्याण का आधार है। ‘गीता भारती’ इसी संदेश का प्रभावी प्रसार करती है।
मार्ग मीडिया, मुंबई द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के 236 पृष्ठ हैं तथा इसका मूल्य 599 रुपए है। श्रीमद्भगवद्गीता को सरल हिंदी मुक्तकों के माध्यम से समझने की इच्छा रखने वाले पाठकों के लिए यह कृति निस्संदेह एक अमूल्य उपहार है।
